सूरदास जी का जीवन परिचय - surdas ka jeevan parichay

surdas ka jeevan parichay

surdas ka jeevan parichay ( सूरदास जी का जीवन परिचय )

Hello दोस्तो स्वागत है आपका gyankibook.com पर । आज के इस लेख मे हम देखेंगे surdas ka jeevan parichay सूरदास का जीवन परिचय कक्षा 10वी के board exam मे जरुर पछता है। इसलिए यह आपके लिये बहुत महत्वपूर्ण है। आप सूरदास का जीवन परिचय याद करके अपने board exam मे अच्छे अंक प्राप्त कर सकते है । और इसलिए आज के इस पोस्ट मे हमने विस्तार मे सूरदास के जीवन परिचय के बारे मे लिखा है तो पोस्ट को अन्तिम तक पडते रहिये तो चलिए देखते है surdas ka jeevan parichay

जीवन परिचय – 

सूरदास भक्ति - काव्य की सगुण धारा की कृष्ण भक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं । कहा जाता है कि इनका जन्म सन् 1478 ई . ( सम्वत् 1535 वि . ) में आगरा से मथुरा जाने वाली सड़क पर स्थित रुनकता में हुआ था । 

कुछ विद्वान् इनका जन्म दिल्ली के निकट सीही नामक ग्राम में मानते हैं । इनके पिता का नाम पं . रामदास सारस्वत था । जनश्रुति है कि सूर जन्म से ही अन्धे थे । परन्तु कुछ विद्वान् इसमें सन्देह करते हैं क्योंकि सूर ने वात्सल्य और श्रृंगार का जैसा अनुपम वर्णन किया है , वैसा जन्मान्ध कवि नहीं कर सकता । अत : उनका बाद में अन्धा होना ही अधिक उचित समीचीन जान पड़ता है।

सूर बचपन से ही विरक्त हो गये थे और गऊघाट में रहकर विनय के पद गाया करते थे । यहाँ पर बल्लाभाचार्य से इनकी भेंट हो गयी । भेंट के समय सूरदास ने उन्हें स्वरचित एक पद गाकर सुनाया । बल्लभाचार्य उसे सुनकर गद्गद् हो गये ।

सूर बल्लभाचार्य के शिष्य बन गये । बल्लभाचार्य से गुरु दीक्षा लेकर उनके आदेशानुसार सूरदास कृष्ण लीला का गान करने लगे । बाद में गुरु जी ने इनको गोवर्धन के श्रीनाथ जी के मन्दिर में कीर्तन का भार सौंप दिया । 

बल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ ने आठ कृष्ण भक्त कवियों का एक मण्डल बनाया जिसे ' अष्टछाप ' कहा जाता है । सूरदास अष्टछाप के प्रमुख और सर्वश्रेष्ठ कवि थे । अपने जीवन के अन्तिम दिनों में सूरदास गोवर्धन के पारसौली नामक स्थान पर चले गये । यहीं पर सन् 1583 ई . ( सम्वत् 1640 वि . ) के लगभग इनका देहावसान हो गया । प्राणान्त होने से पूर्व बिट्ठलनाथ के पूछने पर उन्होंने अग्र पद बनाकर सुनाया

 ' खंजन जैन रूप रस माते । अति सै चारु चपल अनियारे पल पीजरा न समाते । '

जन्म             ---       सन् 1478 ई . ( सम्वत 1535 वि . ) । 
जन्म स्थान     ---       जन्म स्थान पिता रुनकता ( आगरा ) । 
पिता           ---         पं . रामदास सारस्वत । 
मृत्यु           ---         सन् 1583 ई . ( सम्वत् 1640 वि . ) ।
गुरु            ---           स्वामी बल्लभाचार्य  
भाषा          ---         ब्रजभाषा । 
शैली          ---         गीति काव्य की भावपूर्ण और संगीतमयी । 
रस              ---      वात्सल्य , शृंगार ।
अलंकार      ---      उपमा रूपक उत्पेक्षा 
रचनाएँ        ---      साहित्यलहरी सूरसारावली सूरसागर

साहित्यिक परिचय — 

सूर हिन्दी साहित्य के अनुपम कवि हैं । इनका काव्य भाव और कला दोनों ही पक्षों की दृष्टि से उच्चकोटि का काव्य है । सूरदास जी कवि सम्राट हैं और शृंगार रस के श्रेष्ठतम कवि हैं । सूर भक्ति काल की कृष्णाश्रयी शाखा के प्रमुख एवं प्रतिनिधि कवि हैं । निश्चय ही सूरदास हिन्दी साहित्याकाश के सूर्य हैं , जैसा कि निम्न दोहे से स्पष्ट है

सूर - सूर तलसी ससी , उडगन केशवदास । 
अब के कवि खद्योत सम , जह - तह करत प्रकास ॥ 

' अस्तु , हिन्दी साहित्य में सूर का स्थान सर्वोच्च है । ' 

रचनाएँ - 

सूरदास की प्रमुख रचना ' सूरसागर ' है । सूरसागर में उन्होंने सवा लाख पदों का संकलन किया । किन्तु अभी तक केवल साढ़े पाँच हजार पद ही प्राप्त हुए हैं । सूर सारावली ' और ' साहित्य लहरी ' भी सूरदास द्वारा रचित अन्य रचनाएँ हैं ।

Conclusion 

आज के इस post मे हमने surdas ka jeevan parichay को विस्तार से देखा। और हमे यह पता है की इनका जीवन परिचय हमारे board exam के लिये कितना महत्वपूर्ण है।तो इसलिए हमे इसे अच्छे से याद करके board exam मे अच्छे अंक प्राप्त करने है। और मुझे उमीद है की इस लेख से आपको surdas ka jeevan parichay अच्छी तरह से समझ आ गया होगा अगर आपको यह लेख पसंद आया तो आप अपने सुझाओ हमारे साथ शेयर कर सकते है और इस लेख को अपने मित्रो के साथ शेयर भी करे धन्यवाद।

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