तुलसीदास जी का जीवन परिचय - Tulsidas ka jivan parichay

Tulsidas

Tulsidas ka jivan parichay (तुुुलसीदास जी का जीवन परिचय)

जन्म  ---  सन् 1497 ई. (सम्वत् 1554 वि .) ।
जन्म स्थान   ---    राजापुर (बाँदा) ।
पिता   ---   आत्माराम ।
माता   ---   हुलसी ।
गुरु   ---    नरहरिदास ।  
मृत्यु  ---  सन् 1623 ई . (सम्वत् 1680 वि .) ।
भाषा    ---   ब्रज तथा अवधी ।
शैली  ---  दोहा , चौपाई , कवित्त , सवैया , पद ।
रचनाएँ   ---   रामचरितमानस , जानकी मंगल , पार्वती मंगल , रामलला नहछू , बरवै रामायण दोहावली , कवितावली , गीतावली , विनय पत्रिका।

तुलसीदास का जीवन परिचय

जीवन-परिचय -- गोस्वामी तुलसीदास का जन्म संवत् 1554 अर्थात् सन् 1497 ई . माना जाता है परन्तु तुलसीदास के जन्म तिथि तथा जन्म स्थान के विषय में विद्वानों के विभिन्न मत हैं । डॉ . नगेन्द्र के हिन्दी साहित्य के इतिहास के अनुसार उनकी जन्म तिथि तथा जन्म स्थान निम्न हैं --

(1). जन्म तिथि --
(अ) 1497 ई. , (ब) 1526 ई. , (स) 1532 ई.। 

(2). जन्म स्थान --
(अ) राजापुर (बांदा) , (ब) सोरों (एटा) , (स) सूकर क्षेत्र (आजमगढ़)।

तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम दुबे और माँ का नाम हुलसी था। ये सरयूपारीण ब्राह्मण थे। कह जाता है कि मूल नक्षत्र में जन्म होने के कारण इनके माता - पिता ने इनका परित्याग कर दिया था। इस कारण इनका बचपन बड़े कष्ट में व्यतीत हुआ।

सौभाग्य से इनकी भेंट बाबा नरहरिदास से हो गयी। इन्होंने ही इनका पालन - पोषण तथा शिक्षा - दीक्षा की अतः तुलसीदास ने इनको अपना गुरु मान लिया। बड़े होने पर तुलसीदास काशी चले गये। वहाँ शेष सनातन नामक विद्वान् से वेदों , शास्त्रों , पुराणों व दर्शन का गहन अध्ययन किया। अध्ययन समाप्त करके ये अपन जन्मभूमि राजापुर ग्राम लौट आये।

अपने ग्राम में रहते हुए दीनबन्धु पाठक की सुन्दर कन्या रत्नावलि के साथ इनका विवाह हो गया । तुलसीदा ली गई । घर लौटने पर तुलसीदास ने जब अपनी पत्नी को नहीं पाया तो उसका वियोग सहन न कर सके और सीधे लगभग आधी रात के समय अपनी पत्नी के पास पहुंचे। पत्नी को उनका ये व्यवहार उचित नहीं लगा। उन्होंने तुलसी को फटकारा और कहा --

       " लाज न आयी आपको दौरे आयेहु साथ "

पत्नी की यह बात तुलसी के हृदय में ऐसी लगी कि उनका मन संसार से विमुख हो गया और वह संन्यासी होकर राम की भक्ति में लीन हो गये। उन्होंने संन्यास लेकर काशी , चित्रकूट और अयोध्या अदि तीर्थ स्थानों का भ्रमण किया। अब इनका जीवन तीर्थयात्रा , भजन , कीर्तन , सत्संग और राम कथा विवेचन में ही व्यतीत होता था। राम भक्ति और काव्य रचना में रत रहते हुए सन् 1623 ई . (सम्वत् 1680) में काशी के असी घाट पर तुलसीदास जी का स्वर्गवास हो गया।

और भी जीवन परिचय ---

तुलसीदास जी का साहित्यिक परिचय

साहित्यिक परिचय --- तुलसी भक्ति काल की सगुण काव्यधारा की रामाश्रयी शाखा के प्रमुख एवं प्रतिनिधि कवि हैं। इन्होंने रामचरितमानस , विनय पत्रिका जैसे लगभग 12 उत्कृष्ट ग्रन्थों की रचना करके हिन्दी साहित्य की जो अभिवृद्धि की है , वह अन्य किसी कवि ने नहीं की। इनका ' रामचरित मानस ' हिन्दी साहित्य का ही नहीं , अपितु , विश्व साहित्य का श्रेष्ठतम ग्रन्थ है। इसी एकमात्र ग्रन्थ के आधार पर तुलसीदास की गणना , विश्व साहित्य की महान विभूतियों में की जा सकती है। अपनी अद्वितीय काव्य-प्रतिभा , समन्वयवादी भावना और लोकमंगलकारी साधना के कारण तुलसी हिन्दी साहित्य में विशिष्ट स्थान रखते हैं। अत: तुलसी को हिन्दी साहित्य का सर्वश्रेष्ठ कवि माना जा सकता है।

तुलसीदास जी की रचनाएँ

रचनाएँ --- तुलसी ने लगभग 12 ग्रन्थों की रचना की है। उनके प्रमुख ग्रन्थ इस प्रकार हैं -- रामचरित मानस , विनय पत्रिका , कवितावली , गीतावली , दोहावली , बरवै रामायण , पार्वती मंगल , जानकी मंगल , वैराग्य संदीपनी , रामलला नहछू आदि। इन ग्रन्थों में रामचरित मानस हिन्दी का ही नहीं अपितु विश्व का सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य है। समूचे भारत मैं यह ग्रन्थ बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। साहित्य के क्षेत्र में तो इसकी समता का अन्य कोई ग्रन्थ है ही नहीं दूसरा श्रेष्ठ ग्रन्थ विनय पत्रिका है। इसमें तुलसी ने भगवान राम से अपने उद्धार के लिए विनय की है। 
इस प्रकार तुलसीदास हिन्दी साहित्य के अमर कवि माने गये हैं।

आचार्य रामचन्द्र शुक्लआचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीजयशंकर प्रसादपदुमलाल पुन्नालाल बख्शीडॉ. राजेन्द्र प्रसादजय प्रकाश भारतीडॉ. भगवतशरण उपाध्यायश्री रामधारी सिंह दिनकरसूरदास 》तुलसीदासरसखानबिहारीलालसुमित्रानंदन पन्तमहादेवी वर्मापं. रामनरेश त्रिपाठी 》माखन लाल चतुर्वेदी 》सुभद्रा कुमारी चौहान 》त्रिलोचन 》केदारनाथ सिंहअशोक वाजपेयी

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