2024 डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जीवन परिचय | Rajendra Prasad Ka Jivan Parichay

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जीवन परिचय

इस आर्टिकल में हम भारत के प्रथम राष्ट्रपति, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जीवनी को बिल्कुल विस्तार से देखेंगे। इस लेख में हम डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के जीवन से सम्बंधित उन सभी प्रश्नो को समझेंगे को अकसर परीक्षाओं में पुछे जाते है जैसे की, राजेन्द्र प्रसाद का जन्म कब हुआ था, राजेन्द्र प्रसाद का जन्म कहाँ हुआ था, राजेंद्र प्रसाद की पत्नी का नाम क्या था, डॉ राजेंद्र प्रसाद के माता-पिता का नाम, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का मृत्यु कब हुआ था, डॉ राजेंद्र प्रसाद की रचना और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का साहित्य में स्थान आदि। ऐसे ही और भी बहुत से प्रश्नो के उत्तर आपको इस लेख में बिल्कुल संक्षेप में देखने को मिलेंगे। तो, अगर आप rajendra prasad ka jivan parichay अच्छे से समझना चाहते है तो, इस लेख को पुरा अन्त तक अवश्य पढ़े।

15 अगस्त, 1947 को भारत जब स्वतन्त्र हुआ, तो गाँधीजी ने भारतीय प्रजातन्त्र की विशेषता बताते हुए कहा था कि यहाँ का एक किसान भी भारत का राष्ट्रपति बन सकता है। गाँधीजी की यह बात शीघ्र ही सही सिद्ध हुई, जब 26 जनवरी, 1950 को 'सादा जीवन उच्च विचार' की प्रतिमूर्ति एवं बिहार के किसानों का नेतृत्व करने वाले एक महान् व्यक्ति को देश का प्रथम राष्ट्रपति बनाया गया। वह महान् व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि बिहार के गौरव डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे, जिन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में गाँधीजी का साथ देने के लिए अपनी चलती हुई वकालत को तिलांजलि दे दी। आइये अब हम बिल्कुल विस्तारपूर्वक से डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का जीवन परिचय हिंदी में समझे।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की जीवनी (Rajendra Prasad Biography In Hindi)

नाम डॉ. राजेन्द्र प्रसाद
अन्य नाम राजेन बाबू
जन्म तिथि 3 दिसम्बर 1884
जन्म स्थान छपरा जिले के जीरादेई नामक ग्राम में
मृत्यु तिथि 28 फ़रवरी 1963
मृत्यु स्थान पटना, बिहार (भारत)
आयु (मृत्यु के समय) 78 वर्ष
राष्ट्रीयता भारतीय
धर्म हिन्दू
राजनीतिक दल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
शिक्षा कोलकाता विश्वविद्यालय से एम. ए. तथा एल.एम.एम
पुरस्कार भारत रत्न (1962)
माता कमलेश्वरी देवी
पिता महादेव सहाय
भाई महेंद्र प्रसाद
बहन भगवती देवी
पत्नी राजवंशी देवी
पुत्र मृत्युंजय प्रसाद
भाषा विषयानुकूल सरल, शुद्ध प्रवाहमयी
शैली प्रकृति के अनुकूल सरल और सुबोध
रचनाएँ गाँधीजी की देन, भारतीय शिक्षा, साहित्य और संस्कृति, आत्मकथा, आदि।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का जीवन परिचय (Dr. Rajendra Prasad Ka Jeevan Parichay)

राजेन्द्र प्रसाद का जन्म बिहार प्रान्त के सीवान जिले में जीरादेई नामक गाँव में 3 दिसम्बर, 1884 को हुआ था। उनके पिता श्री महादेव सहाय एक विद्वान् व्यक्ति थे एवं माता श्रीमती कमलेश्वरी देवी एक धर्मपरायण महिला थीं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा गाँव में ही हुई। राजेन्द्र बाबू अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि के छात्र थे। उन्होंने पाँच वर्ष की आयु में एक मौलवी साहब से फ़ारसी पढ़ना शुरू किया, उसके बाद वे छपरा के जिला स्कूल में पढ़ने गए।

जिला स्कूल से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे पटना स्थित टीके घोष अकादमी में पढ़ने के लिए गए। इसी दौरान 13 वर्ष की उम्र में राजवंशी देवी के साथ उनका विवाह हो गया। वर्ष 1902 में 18 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करने के बाद राजेन्द्र प्रसाद ने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में दाखिला ले लिया।

इसके बाद कानून में करियर की शुरुआत करने के लिए उन्होंने बैचलर ऑफ़ लॉ की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने अपनी पढ़ाई के दौरान भी भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यद्यपि स्नातक स्तरीय परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ही वे राजनीति में सक्रिय हो चुके थे, किन्तु राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी और वर्ष 1915 में स्वर्ण पदक के साथ विधि परास्नातक (एलएलएम) की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद उन्होंने लॉ में डॉक्टरेट की उपाधि भी हासिल की।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी की स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी

कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पटना उच्च न्यायालय में वकालत प्रारम्भ कर दी। अपने सद्व्यवहार एवं कुशलता के कारण उन्होंने वकालत में खूब नाम कमाया और एक प्रसिद्ध वकील बनकर उभरे। उसी दौरान वर्ष 1917 में जब चम्पारण के किसानों को न्याय दिलाने के लिए गाँधीजी बिहार आए, तो डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का उनसे मिलना हुआ।

गांधीजी की कर्मठता, लगन, कार्य-शैली एवं साहस से वे अत्यधिक प्रभावित हुए। इसके बाद बिहार में सत्याग्रह का नेतृत्व राजेन्द्र प्रसाद ने ही किया। उन्होंने बिहार की जनता के समक्ष गाँधीजी का सन्देश इस तरह प्रस्तुत किया कि लोग उन्हें बिहार का गाँधी ही कहने लगे। वर्ष 1920 में गाँधीजी ने जब असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ किया, तो उनके आह्वान पर राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी चलती हुई वकालत छोड़ दी और स्वाधीनता संग्राम में कूद गए।

इसके बाद गाँधीजी द्वारा छेड़े गए हर आन्दोलन में ये उनके साथ नजर आने लगे। उन्होंने नेशनल कॉलेज एवं बिहार विद्यापीठ की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई। गाँधीजी के आन्दोलनों में सहयोग देने के कारण कई बार उन्हें जेल की यात्रा भी करनी पड़ी। वर्ष 1922 में गाँधीजी ने जब 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' को चौरी - चौरा काण्ड के बाद स्थगित करने की घोषणा की, तब उनकी अधिकतर नेताओं ने आलोचना की, किन्तु उस समय भी राजेन्द्र बाबू ने उनका साथ दिया।

वर्ष 1930 में जब गाँधीजी ने नमक सत्याग्रह प्रारम्भ किया, तो राजेन्द्र प्रसाद ने पटना में एक तालाब पर अपने साथियों के साथ नमक बनाकर सरकार के 'नमक पर कर कानून का विरोध किया। इसके लिए उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। में वर्ष 1914 में बिहार और बंगाल में आई बाढ़ में उन्होंने काफी बढ़ - चढ़कर सेवा कार्य किया। वर्ष 1934 में जब बिहार में भूकम्प आया, तो राजेन्द्र प्रसाद ने भूकम्प राहत कार्य का संचालन किया।

अक्टूबर, 1934 में वे बम्बई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए तथा वर्ष 1939 में सुभाषचन्द्र बोस के अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने के बाद ये कांग्रेस के कार्यवाहक अध्यक्ष बनाए गए। वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में भी राजेन्द्र प्रसाद की भूमिका सराहनीय थी। वर्ष 1946 में जब अन्तरिम सरकार बनी, तब उनके नेतृत्व क्षमता एवं गुणों को देखते हुए उन्हें खाद्य एवं कृषि मन्त्री बनाया गया। इसी वर्ष जब भारत का संविधान बनाने के लिए एक संविधान सभा का गठन किया गया, तो उन्हें इसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया।

राजेन्द्र प्रसाद प्रथम राष्ट्रपति के रूप में

26 जनवरी, 1950 को जब भारत गणतन्त्र बना, तो वे भारत के प्रथम राष्ट्रपति बनाए गए। वर्ष 1952 में नई सरकार के गठन के बाद वे पुन: इस पद के लिए निर्वाचित हुए। वर्ष 1957 में भी राष्ट्रपति के चुनाव में उन्हें विजयश्री हासिल हुई। राष्ट्रपति पद पर रहते हुए उन्होंने कई देशों की यात्राएँ भी की। लगातार दो कार्यकाल पूरा करने वाले वे भारत के एकमात्र राष्ट्रपति हैं। वे 14 मई, 1962 तक देश के सर्वोच्च पद पर आसीन रहे। इसके बाद अस्वस्थता की वजह से वे अपने पद से अवकाश प्राप्त कर पटना के सदाकत आश्रम में रहने चले गए। 

इसी वर्ष भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारत रत्न' से अलंकृत किया। राजेन्द्र प्रसाद आजीवन गाँधीजी के विचारों का पालन करते रहे, किन्तु जब वर्ष 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया, तो अस्वस्थ होते हुए भी वे जनता का स्वाभिमान जगाने को उतावले हो गए और रोग-शैया छोड़कर पटना के गाँधी मैदान में ओजस्वी भाषण देते हुए उन्होंने कहा- "अहिंसा हो या हिंसा, चीनी आक्रमण का सामना हमें करना है।" इससे उनकी देशभक्ति की अनन्य भावना का पता चलता है।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की साहित्यिक अभिरुचि

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी 'आत्मकथा' (1946) के अतिरिक्त कई पुस्तकें भी लिखीं, जिनमें 'बापू के कदमों में 1954' , 'इण्डिया डिवाइडेड 1946' , 'सत्याग्रह एट चम्पारण 1922' , 'गाँधीजी की देन' , 'भारतीय संस्कृति व खादी का अर्थशास्त्र' , 'महात्मा गाँधी एण्ड बिहार' इत्यादि उल्लेखनीय हैं। यद्यपि राजेन्द्र बाबू की पढ़ाई फारसी और उर्दू में हुई तथापि बी ए में उन्होंने हिन्दी ही ली। 

वे अंग्रेजी, हिन्दी, उर्दू , फारसी, बंगाली भाषा व साहित्य से पूरी तरह परिचित थे तथा गुजराती भाषा का भी उन्हें व्यावहारिक ज्ञान था। एम एल परीक्षा के लिए हिन्दू कानून का उन्होंने संस्कृत ग्रन्थों से ही अध्ययन किया था। हिन्दी के प्रति उनका अगाध प्रेम था। हिन्दी पत्र - पत्रिकाओं, जैसे - 'भारत मित्र' , 'भारतोदय' , 'कमला' आदि में उनके लेख छपते थे, जो सुरुचिपूर्ण तथा प्रभावकारी होते थे। उन्होंने हिन्दी के 'देश' और अंग्रेज़ी के 'पटना लॉ बीकली' समाचार पत्र का सम्पादन भी किया। वर्ष 1926 में वे बिहार प्रदेशीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन तथा वर्ष 1927 में उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के सभापति थे। 

वे राष्ट्रभाषा हिन्दी के विकास एवं प्रसार के लिए सदा प्रयत्नशील रहे तथा इस कार्य के लिए वे अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन के साथ आजीवन जुड़े रहे। राष्ट्रपति भवन के वैभवपूर्ण वातावरण में रहते हुए भी डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी सादगी एवं पवित्रता को कभी भंग नहीं होने दिया। सरोजिनी नायडू ने उनके बारे में लिखा था- "उनकी असाधारण प्रतिभा, उनके स्वभाव का अनोखा माधुर्य, उनके चरित्र की विशालता और अति त्याग के गुण ने शायद उन्हें हमारे सभी नेताओं से अधिक व्यापक और व्यक्तिगत रूप से प्रिय बना दिया है।

गाँधीजी के निकटतम शिष्यों में उनका वही स्थान है, जो ईसा मसीह के निकट सेण्ट जॉन का था। "अपने जीवन के आखिरी महीने बिताने के लिए उन्होंने पटना के निकट सदाकत आश्रम चुना। 28 फरवरी, 1963 को राजेन्द्र प्रसाद ने पटना के सदाकत आश्रम में अपनी अन्तिम साँस ली। वे आज हमारे बीच भले ही उपस्थित न हों, पर कृतज्ञ राष्ट्र उनके योगदान को कभी भूल नहीं सकता। उनके निधन से राष्ट्र ने एक महान् सपूत को खो दिया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद 'सादा जीवन उच्च विचार' की प्रतिमूर्ति थे। उनका जीवन हम सबके लिए अनुकरणीय है।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की भाषा

आपकी शैली प्रकृति के अनुकूल सरल और सुबोध है। वह कृत्रिमता और आडम्बर से रहित है। आपने छोटे और बड़े दोनों प्रकार के वाक्यों का भी प्रयोग किया है जो अत्यन्त सार्थक हैं। कहीं-कहीं गम्भीर भावों को प्रकट करने के लिए अलंकारों का प्रयोग किया है। आपने विचारात्मक शैली में क्रमबद्ध विचारों को छोटे-छोटे वाक्यों में उदाहरण द्वारा प्रस्तुत किया है। गम्भीर विषयों को साहित्यिक शैली में लिखा है।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का साहित्य में स्थान

यद्यपि डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एक बड़े राजनीतिज्ञ और सच्चे समाजसेवी थे किन्तु साहित्यकार के रूप में भी उनका कम महत्त्व नहीं है। राजनीति और देश सेवा में व्यस्त रहते हुए भी हिन्दी के प्रचार और साहित्य सम्वर्द्धन में उनका योगदान विशेष महत्त्वपूर्ण है। अतः राजनीतिक क्षेत्र की भाँति हिन्दी साहित्य में भी इनका प्रमुख स्थान है।

FAQ: डॉ. राजेंद्र प्रसाद के जीवन से जुड़े कुछ प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न -- राजेन्द्र प्रसाद का जन्म कब हुआ था?
उत्तर -- राजेन्द्र प्रसाद का जन्म 3 दिसम्बर 1884 को हुआ था।

प्रश्न -- राजेन्द्र प्रसाद का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर -- जीरादेई नामक ग्राम में।

प्रश्न -- डॉ राजेंद्र प्रसाद के माता-पिता का नाम?
उत्तर -- डॉ राजेंद्र प्रसाद के माता का नाम कमलेश्वरी देवी और पिता का नाम महादेव सहाय था।

प्रश्न -- राजेंद्र प्रसाद की पत्नी का नाम क्या था?
उत्तर -- राजवंशी देवी

प्रश्न -- राजेंद्र प्रसाद के पुत्र का नाम क्या था?
उत्तर -- मृत्युंजय प्रसाद

प्रश्न -- डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का मृत्यु कब हुआ था?
उत्तर -- डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद का मृत्यु 28 फ़रवरी 1963 को पटना, बिहार (भारत) में हुआ था।

प्रश्न -- राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति कब बने?
उत्तर -- राजेन्द्र प्रसाद 26 जनवरी, 1950 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने।

प्रश्न -- राजेन्द्र प्रसाद को भारत रत्न कब मिला?
उत्तर -- राजेन्द्र प्रसाद को भारत रत्न 1962 में मिला था।

प्रश्न -- डॉ राजेंद्र प्रसाद की रचना?
उत्तर -- आत्मकथा, भारतीय शिक्षा, गाँधीजी की देन, साहित्य और संस्कृति।

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निष्कर्ष

यहा पर हमने dr. rajendra prasad biography in hindi को बिल्कुल विस्तार से समझा। हमने इस लेख में राजेंद्र प्रसाद जी के व्यक्तिक जीवन से जुड़े कई सवालों के जवाब जाने जिससे की आपको इनकी जीवनी को अच्छे समझने में असानी हो। हम आशा करते है की आपको यह लेख जरुर पसन्द आया होगा और हमे उमीद है की इस लेख की सहायता से राजेंद्र प्रसाद का जीवन परिचय को समझने में आपको काफी मदद मिली होगी। अगर आपके मन में इस लेख से सम्बंधित कोई प्रश्न हो तो, आप हमे नीचे कमेंट करके पुछ सकते है। साथ ही इस dr. rajendra prasad ki jeevani को आप अपने सहपाठी और मित्र के साथ शेयर जरुर करे।

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