रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय | Ramdhari Singh Dinkar Ka Jivan Parichay


इस आर्टिकल में हम श्री रामधारी सिंह दिनकर जी के जीवन परिचय को विस्तार से देखेंगे। हम यहा पर इनके जीवन परिचय के साथ-साथ इनके कृतियाँ, साहित्यिक परिचय, भाषा शैली और साहित्य में स्थान को भी विस्तार से देखेंगे। तो, अगर आप ramdhari singh dinkar ka jeevan parichay विस्तार से पढ़ना चाहते है तो, इस आर्टिकल को पुरा अन्त तक पढ़ें।

रामधारी सिंह दिनकर का जीवन परिचय (Ramdhari Singh Dinkar Ka Jivan Parichay)

जन्म  ---  सन् 1908 ई.।
जन्म स्थान  ---  मुंगेर (बिहार)।
शिक्षा  ---  बी. ए.।
मृत्यु  ---  सन् 1974 
भाषा  ---  ओजपूर्ण भाषा।
शैली  ---  प्रवाहयुक्त, उद्बोधन शैली, गम्भीर विचारात्मक।
रचनाएँ  ---  काव्य -- रेणुका, हुँकार, कुरुक्षेत्र, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतिज्ञा। गद्य -- अर्द्ध नारीश्वर, बट-पीपल, उजली आग, भारतीय संस्कृति के चार अध्याय।

श्री रामधारी सिंह दिनकर जी का जीवन परिचय

श्री दिनकर जी का जन्म सन् 1908 में बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया घाट नामक ग्राम में में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। कविता लिखने का शौक विद्यार्थी जीवन से ही था। हाईस्कूल पास करने के बाद ही आपने 'प्राण भंग' नामक काव्य पुस्तक लिखी जो सन् 1929 में प्रकाशित हुई। सन् 1932 में बी. ए. परीक्षा उत्तीर्ण करके आपने एक उच्च माध्यमिक विद्यालय में प्रधान अध्यापक के पद पर कार्य किया।

इसके बाद अवर निबन्धक के पद पर सरकारी नौकरी में चले गये। बाद में प्रचार विभाग के निदेशक के पद पर स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद तक कार्य करते रहे। इसके बाद आपने बिहार विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर कुछ समय तक कार्य किया। तत्पश्चात् भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे। अन्त में भारत सरकार के गृह विभाग में हिन्दी सलाहकार के रूप में एक लम्बे अरसे तक हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यरत रहे।

आपको ज्ञानपीठ और साहित्य अकादमी के पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। सन् 1959 में भारत सरकार ने आपको 'पद्म भूषण' की उपाधि से अलंकृत किया और सन् 1962 में भागलपुर विश्वविद्यालय ने आपको डी. लिट् की मानद उपाधि से सम्मानित किया। इस प्रकार हिन्दी की अनवरत सेवा करते हुए सन् 1974 में हिन्दी साहित्याकाश का यह 'दिनकर' सदा-सदा के लिए अस्त हो गया।

श्री रामधारी सिंह दिनकर का साहित्यिक परिचय

दिनकर जी आधुनिक युग के एक ऐसे उदीयमान साहित्यकार हैं जिन्होंने बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक हिन्दी-साहित्य की अनवरत सेवा की है। आप कवि और कुशल गद्यकार के रूप में साहित्य जगत में जाने जाते हैं। आपने गद्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति, दर्शन और कला का गम्भीर विवेचन प्रस्तुत किया है। साथ ही हिन्दी के प्रचार के लिए स्तुत्य कार्य किया है। इस प्रकार 'दिनकर' जी ने हिन्दी की महान् सेवा की है। अत : आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रणेताओं में 'दिनकर' जी का स्थान दिनकर के सदृश सर्वोच्च है।

श्री रामधारी सिंह दिनकर की कृतियाँ

दिनकर जी बहुमुखी प्रतिभा के कलाकार थे। आपकी प्रसिद्धि का मूल आधार कविता है। लेकिन गद्य लेखन में भी आप पीछे नहीं रहे और अनेक अनमोल गद्य ग्रन्थ लिखकर हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धिव की है आपकी रचनाएँ निम्नलिखित हैं

गद्य ग्रन्थ --- अर्द्धनारीश्वर, मिट्टी की ओर, रेती के फूल  बट पीपल, उजली आग, भारतीय संस्कृति के चार अध्याय, हमारी सांस्कृतिक एकता।
काव्य ग्रन्थ --- प्रण भंग, रेणुका, रसवन्ती, सामधेनी, बापू, हुँकार, रश्मिरथी, परशुराम की प्रतिज्ञा, आदी।
महाकाव्य --- कुरुक्षेत्र, उर्वशी।
बाल निबन्ध --- मिर्च का मजा, सूरज का ब्याह, चित्तौड़ का सांका।

श्री रामधारी सिंह दिनकर की भाषा

दिनकर जी की भाषा शुद्ध और परिमार्जित खड़ी बोली है। इसमें उर्दू, अंग्रेजी तथा देशज शब्दो का उन्मुक्त प्रयोग मिलता है। आपकी भाषा में संस्कृत के तत्सम शब्दों का भी बाहुल्य है। आपकी भाषा सहज  प्रवाहमयी है, इसमें कृत्रिमता नाम मात्र को नहीं है। मुहावरों और कहावतों के प्रयोग से भाषा सजीव और ओजमयी हो गयी है। विषय के अनुरूप इनकी भाषा सर्वत्र परिवर्तित होती रहती है।

श्री रामधारी सिंह दिनकर की शैली

दिनकर की शैली को तीन रूपों में विभाजित किया जा सकता है — विवेचनात्मक शैली, उध्दृरण शैली और सूक्ति शैली। उनकी गद्य की प्रमुख शैली विवेचनात्मक ही है। यह शैली प्रभावोत्पादक तथा सारयुक्त है। उद्धरण शैली में लेखक अपनी बात की पुष्टि के लिए अन्य विद्वानों के कथनों को उद्धृत करता चलता है सूक्ति शैली में इस प्रकार के उदाहरण दिये जाते हैं जिसका सार्वजनिक महत्त्व होता है। दिनकर जी की शैली में इस प्रकार के उद्धरण और सूक्ति वचनों की भरमार है। ईर्ष्या तू न गई मेरे मन से पाठ उनकी इस शैली का एक ज्वलन्त उदाहरण है। इस प्रकार दिनकर जी एक चतुर भाषा - शिल्पी और कुशल शैलीकार हैं।

श्री रामधारी सिंह दिनकर साहित्य में स्थान

दिनकर जी आधुनिक युग के एक ऐसे उदीयमान साहित्यकार हैं, जिन्होने बाल्यावस्था से वृद्धावस्था तक हिन्दी और साहित्य की अनवरत सेवा की है। आप सहृदय कवि और कुशल गद्यकार के रूप में साहित्य जगत में जाने जाते हैं। आपने गद्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति, दर्शन और कला का गम्भीर विवेचन प्रस्तुत किया है। साथ ही हिन्दी के प्रचार के लिए स्तुत्य कार्य किया है। इस प्रकार 'दिनकर' जी ने हिन्दी की महान् सेवा की है। अतः आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रणेताओं में 'दिनकर' जी का स्थान दिनकर के सदृश सर्वोच्च है।

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