मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय | Premchand Ka Jeevan Parichay

मुंशी प्रेमचंद

इस आर्टिकल में हम मुंशी प्रेमचंद जी के जीवन परिचय को विस्तार से देखेंगे। इस लेख में हम प्रेमचंद जी के जीवन से सम्बंधित उन सभी प्रश्नो को समझेंगे को अकसर परीक्षाओं में पुछे जाते है जैसे की प्रेमचंद का जन्म कब हुआ था, प्रेमचंद का जन्म कहाँ हुआ था, प्रेमचंद की मृत्यु कब हुई, मुंशी प्रेमचंद के पुत्र का नाम क्या है, प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएं और प्रेमचंद का साहित्य में स्थान आदि। ऐसे ही और भी बहुत से सवालों के जवाब आपको इस लेख में देखने को मिल जायेंगे तो, अगर आप Premchand Ka Jeevan Parichay अच्छे से समझना चाहते है तो इस लेख को पुरा अन्त तक अवश्य पढ़े।

हिन्दी न केवल भारत की आधिकारिक भाषा है, बल्कि अंग्रेज़ी एवं मन्दारिन (चीन की भाषा) के बाद दुनिया में सर्वाधिक बोली जाने वाली तीसरी भाषा भी है। यही कारण है कि इसके पाठकों की संख्या दुनियाभर में करोड़ों में है और हिन्दी के दुनियाभर के इन करोड़ों पाठकों में शायद ही कोई ऐसा होगा, जो प्रेमचन्द को न जानता हो। प्रेमचन्द, जिन्हें दुनिया 'उपन्यास सम्राट' के रूप में जानती है, को साहित्य जगत ने उनके लेखन से प्रभावित होकर उन्हें 'कलम के सिपाही' का उपनाम दिया है। चलिये प्रेमचन्द जी की सम्पुर्ण जीवनी को हम बिल्कुल विस्तार समझेंगे।

नाम प्रेमचन्द
उपनाम मुंशी प्रेमचंद, कलम के सिपाही, नवाब राय
बचपन का नाम धनपत राय श्रीवास्तव
जन्म तिथि 31 जुलाई 1880 ई॰
जन्म स्थान लमही, वाराणसी, उत्तर प्रदेश (भारत)
मृत्यु तिथि 8 अक्टूबर 1936 ई॰
मृत्यु स्थल वाराणसी, उत्तर प्रदेश (भारत)
आयु (मृत्यु के समय) 56 वर्ष
व्यवसाय लेखक, अध्यापक, पत्रकार
अवधि काल आधुनिक काल
राष्ट्रीयता भारतीय
धर्म हिंदू
भाषा हिंदी, उर्दू
पिता अजायब राय
माता आनन्दी देवी
बहन सुग्गी राय
पत्नी शिवरानी देवी (विवा 1906 - 1936)
बच्चे अमृत राय, कमला देवी, श्रीपत राय
प्रमुख कृतियाँ गोदान, गबन, कर्मभूमि, रंगभूमि, सेवासदन, निर्मला, प्रेमाश्रम

प्रेमचन्द का जीवन परिचय (Premchand Ka Jeevan Parichay)

प्रेमचन्द, जिनके बचपन का नाम धनपत राय था, का जन्म 31 जुलाई, 1880 को उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निकट लमही नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम मुंशी अजायब राय तथा माँ का नाम आनन्दी देवी था। प्रेमचन्द जब सात वर्ष के थे, तब उनकी माँ का निधन हो गया, जिसके पश्चात् उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली। विमाता की अवहेलना एवं निर्धनता के कारण उनका बचपन अत्यन्त कठिनाइयों में बीता।

प्रेमचन्द की प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही हुई। जब वे पढ़ाई कर रहे थे, तब ही पन्द्रह वर्ष की अल्प आयु में उनका विवाह कर दिया गया। विवाह के बाद घर-गृहस्थी का बोझ उनके कन्धों पर आ गया था। घर-गृहस्थी एवं अपनी पढ़ाई का खर्चा चलाने के लिए उन्होंने ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। इसी तरह से संघर्ष करते हुए उन्होंने बी ए तक की शिक्षा पूरी की। इस बीच उनका अपनी पहली पत्नी से अलगाव हो गया, जिसके बाद उन्होंने शिवरानी देवी से दूसरा विवाह कर लिया।

पढ़ाई पूरी करने के बाद वे एक अध्यापक के रूप में सरकारी नौकरी करने लगे और बाद में सफलता प्राप्त करते हुए स्कूल इंस्पेक्टर के पद पर पहुँच गए। वर्ष 1920 में जब गाँधीजी ने असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ किया, तो प्रेमचन्द ने उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर सरकारी नौकरी त्याग दी। सरकारी नौकरी छोड़ने के बाद वे ब्रिटिश सरकार के विरोध में जनता को जागरूक करने के लिए लिखना शुरू कर दिया। 'रफ्तार-ए-ज़माना' नामक पत्रिका में वे नियमित रूप से लिखते रहे।

यह मासिक पत्रिका कानपुर से प्रकाशित होती थी। इस कार्य के लिए उन्होंने अपने सम्पादन में वर्ष 1930 में बनारस से 'हंस' नामक एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। आर्थिक अभाव एवं अंग्रेजों की गलत नीतियों के कारण विवश होकर इन्होंने इसका प्रकाशन बन्द कर दिया। 'हंस' के अतिरिक्त उन्होंने 'मर्यादा' , 'माधुरी' एवं 'जागरण' जैसी पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया।

प्रेमचन्द का साहित्य में योगदान

प्रेमचन्द पहले नवाब राय के नाम से लिखते थे, जब उनकी कुछ रचनाओं, जिनमें 'सोजेवतन' प्रमुख है, को ब्रिटिश सरकार ने जब्त कर लिया, तो उन्होंने प्रेमचन्द के छद्म नाम से लिखना शुरू किया। उर्दू में प्रकाशित होने वाली 'जमाना' पत्रिका के सम्पादक और उनके दोस्त दयानारायण निगम ने प्रेमचन्द नाम से लिखने की सलाह दी थी। बाद में ये इसी नाम से प्रसिद्ध हो गए। प्रेमचन्द ने सबसे पहले जिस कहानी की रचना की थी, उसका नाम है - 'दुनिया का सबसे अनमोल रत्न' , जो पूनम नामक उर्दू कहानी संग्रह में प्रकाशित हुई थी। 

उनकी अन्तिम कहानी 'कफन' थी। उन्होंने अठारह उपन्यासों की रचना की, जिनमें सेवासदन, निर्मला, कर्मभूमि, गोदान, गबन, प्रतिज्ञा, रंगभूमि उल्लेखनीय हैं। 'मंगल सूत्र' उनका अन्तिम उपन्यास था, जिसे वे पूरा नहीं कर पाए। इस उपन्यास को उनके पुत्र अमृत राय ने पूरा किया। उनके द्वारा रचित तीन सौ से अधिक कहानियों में 'कफन' , 'शतरंज के खिलाड़ी' , 'पूस की रात' , 'ईदगाह' , 'बड़े घर की बेटी' , 'पंच परमेश्वर' इत्यादि उल्लेखनीय हैं। उनकी कहानियों का संग्रह 'मानसरोवर' नाम से आठ भागों में प्रकाशित है।

उनके द्वारा रचित नाटकों में 'संग्राम' , 'कर्बला' , 'रूठी रानी तथा 'प्रेम की वेदी' प्रमुख हैं। उन्होंने इन सबके अतिरिक्त कई निबन्ध तथा जीवन चरित भी लिखे। उनके निबन्धों का संग्रह 'प्रेमचन्द के श्रेष्ठ निबन्ध' नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित है। उन्होंने कुछ पुस्तकों का अनुवाद भी किया, जिनमें 'सृष्टि का प्रारम्भ' , 'आज़ाद' , 'अहंकार' , 'हड़ताल' तथा 'चाँदी की डिबिया' उल्लेखनीय हैं। प्रेमचन्द ने संवैधानिक सुधारों तथा सोवियत रूस और टर्की में हुई क्रान्ति आदि विषयों पर भी अधिक लिखा।

उनकी कई कृतियाँ अंग्रेजी, रूसी, जर्मन सहित अनेक भाषाओं में भी अनुवाद की गई हैं। प्रेमचन्द ने अपने साहित्य के माध्यम से भारत के दलित एवं उपेक्षित वर्गों का नेतृत्व करते हुए उनकी पीड़ा एवं विरोध को वाणी प्रदान की। उनकी रचनाओं का एक उद्देश्य होता था। अपनी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने न केवल सामाजिक बुराइयों के दुष्परिणामों की व्याख्या की, बल्कि उनके निवारण के उपाय भी बताए। 

उन्होंने बाल विवाह, बेमेल विवाह, विधवा विवाह, सामाजिक शोषण, अन्धविश्वास इत्यादि सामाजिक समस्याओं को अपनी कृतियों का विषय बनाया एवं उनमें यथासम्भव इनके समाधान भी प्रस्तुत किए। 'कर्मभूमि' नामक उपन्यास के माध्यम से उन्होंने छुआछूत की गलत भावना एवं अछूत समझे जाने वाले लोगों के उद्धार का मार्ग बताया है।

उन्होंने लगभग अपनी सभी रचनाओं में धर्म के ठेकेदारों की पूरी आलोचना की है एवं समाज में व्याप्त बुराइयों के लिए उन्हें जिम्मेदार मानते हुए जनता को उनसे सावधान रहने का सन्देश दिया है। 'सेवासदन' नामक उपन्यास के माध्यम से उन्होंने नारी शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई है। अपनी कई रचनाओं में उन्होंने हिन्दू - मुस्लिम साम्प्रदायिकता पर गहरा आघात किया एवं 'कर्बला' नामक नाटक के माध्यम से उनमें एकता व भाईचारा बढ़ाने का सार्थक प्रयास किया।

प्रेमचन्द का सामाजिक योगदान

इस प्रकार देखा जाए तो अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रेमचन्द ने न केवल 'कलम के सिपाही' के रूप में ब्रिटिश सरकार से लोहा लिया, बल्कि समाज सुधार के पुनीत कार्य को भी अंजाम दिया। प्रेमचन्द ने हिन्दी में आदर्शोन्मुख यथार्थवाद की शुरुआत की। उनके उपन्यास 'गोदान' को यथार्थवादी उपन्यास की संज्ञा दी जाती है, क्योंकि इसके नायक होरी के माध्यम से उन्होंने समाज के यथार्थ को दर्शाया है। गाँव का निवासी होने के कारण उन्होंने किसानों के ऊपर हो रहे अत्याचारों को नज़दीक से देखा था, इसलिए उनकी रचनाओं में यथार्थ के दर्शन होते हैं।

उन्हें लगता था कि सामाजिक शोषण एवं अत्याचारों का उपाय गाँधीवादी दर्शन में है, इसलिए उनकी रचनाओं में गाँधीवादी दर्शन की भी प्रधानता देखने को मिलती है। प्रेमचन्द ने गाँव के किसान एवं मोची से लेकर शहर के अमीर वर्ग एवं सरकारी कर्मचारियों तक को अपनी रचनाओं का पात्र बनाया है। वस्तुतः यदि कोई व्यक्ति उत्तर भारत के रीति-रिवाजों, भाषाओं, लोगों के व्यवहार, भारतीय नारियों की स्थिति, जीवन-शैली, प्रेम प्रसंगों इत्यादि को जानना चाहे, तो वह प्रेमचन्द के साहित्य में ही पूरा-पूरा उपलब्ध हो पाएगा।

उनके पात्र साधारण मानव हैं, आम व्यक्ति हैं। ग्रामीण अंचल ही उनका कैनवास है। उन्होंने तत्कालीन समाज का चित्रण इतनी सच्चाई और ईमानदारी से किया है कि वह वास्तव में सजीव लगता है। प्रेमचन्द की तुलना मैक्सिम गोर्की, थॉमस हार्डी जैसे लेखकों से की जाती है। उपन्यास के क्षेत्र में उनके योगदान को देखकर बंगाल के विख्यात उपन्यासकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय ने उन्हें 'उपन्यास सम्राट' कहकर सम्बोधित किया।

प्रेमचन्द ने मोहन दयाराम भवनानी की अजन्ता सिनेटोन कम्पनी में कहानी लेखक की नौकरी भी की, उन्होंने वर्ष 1934 में प्रदर्शित फिल्म 'मज़दूर' की कथा लिखी। सत्यजीत राय ने उनकी दो कहानियों पर यादगार फ़िल्में बनाईं वर्ष 1977 में 'शतरंज के खिलाड़ी' तथा वर्ष 1981 में 'सद्गति'। वर्ष 1938 में सुब्रह्मण्यम ने 'सेवासदन' उपन्यास पर फ़िल्म बनाई। वर्ष 1977 में मृणाल सेन ने उनकी कहानी 'कफ़न' पर आधारित 'ओका ऊरी कथा' नामक तेलुगू फ़िल्म बनाई, जिसे सर्वश्रेष्ठ तेलुगू फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।

इस महान हिन्दी व उर्दू के लेखक, उपन्यास सम्राट, प्रेमचन्द का 8 अक्टूबर, 1936 को जलोदर नामक एक बीमारी के कारण निधन हो गया। इस प्रकार, प्रेमचन्द ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय आदि विधाओं में साहित्य की रचना कर भावी पीढ़ी के युवाओं, महिलाओं आदि को गहराई से प्रभावित किया। भारत के नवनिर्माण एवं नवजागरण के लिए साहित्य सृजन का मार्ग बनाने वाले प्रेमचन्द की रचनाओं के माध्यम से हिन्दी को दुनियाभर में एक विशिष्ट पहचान मिली। इसके लिए हिन्दी साहित्य प्रेमचन्द का हमेशा ऋणी रहेगा।

प्रेमचन्द की प्रमुख कृतियाँ

प्रेमचन्द मुख्य रूप से कहानी और उपन्यासों के लिए प्रसिद्ध हैं, परन्तु इन्होंने नाटक और निबन्ध को भी अपनी समर्थ लेखनी का विषय बनाया। इनकी प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं

(1) उपन्यास -- प्रेमचन्द जी ने 'गोदान' , 'सेवासदन' , 'कर्मभूमि' , 'रंगभूमि' , 'गबन' , 'प्रेमाश्रम' , 'निर्मला' , 'वरदान' और 'कायाकल्प' नामक उपन्यास लिखे। 

(2) कहानी -- संग्रह-प्रेमचन्द ने लगभग 300 कहानियाँ लिखीं। इनके कहानी-संग्रहों में 'सप्तसुमन' , 'नवनिधि' , 'प्रेम पचीसी' , 'प्रेम-प्रसून' , 'मानसरोवर' (आठ भाग) प्रमुख हैं।

(3) नाटक -- 'संग्राम' , 'प्रेम की वेदी' , 'कर्बला' और 'रूठी रानी'

(4) निबन्ध -- 'कुछ विचार' और 'साहित्य का उद्देश्य'

(5) सम्पादन -- माधुरी, मर्यादा, हंस, जागरण आदि।

इनके अतिरिक्त इन्होंने 'तलवार और त्याग' , दुर्गादास आदि जीवनी, बालोपयोगी साहित्य और कुछ पुस्तकों के अनुवाद द्वारा हिन्दी-साहित्य के भण्डार की अभिवृद्धि की है।

FAQ: प्रेमचन्द जी के जीवन से जड़े कुछ प्रश्न और उनके उत्तर

प्रश्न -- प्रेमचंद का जन्म कब हुआ था?
उत्तर -- प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को हुआ था।

प्रश्न -- प्रेमचंद का जन्म कहाँ हुआ था?
उत्तर -- प्रेमचंद जी का जन्म उत्तर प्रदेश में वाराणसी के निकट लमही नामक ग्राम में हुआ था।

प्रश्न -- प्रेमचंद की मृत्यु कब हुई थी?
उत्तर -- 8 अक्टूबर 1936 को।

प्रश्न -- प्रेमचंद के माता-पिता का नाम?
उत्तर -- प्रेमचंद के माता का नाम आनन्दी देवी और पिता का नाम अजायब राय था।

प्रश्न -- मुंशी प्रेमचंद के पुत्र का नाम क्या है?
उत्तर -- अमृत राय, श्रीपत राय।

प्रश्न -- मुंशी प्रेमचंद का पूरा नाम क्या है?
उत्तर -- प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।

प्रश्न -- मुंशी प्रेमचंद की प्रमुख कृतियाँ?
उत्तर -- गोदान, कर्मभूमि, रंगभूमि, गबन, सेवासदन, निर्मला।

प्रश्न -- प्रेमचंद का पहला उपन्यास?
उत्तर -- सेवासदन।

प्रश्न -- प्रेमचंद ने कितने उपन्यास लिखे हैं?
उत्तर -- प्रेमचंद जी ने लगभग 300 कहानियाँ तथा डेढ़ दर्जन उपन्यास लिखे।

निष्कर्ष

यहा पर हमने Premchand Biography In Hindi को बिल्कुल विस्तार से समझा। इस लेख में हमने प्रेमचंद जी के व्यक्तिक जीवन से जुड़े कई सारे सवालों के जवाब जाने जिससे की आपको इनकी जीवनी को अच्छे से समझने में असानी हो। हम आशा करते है की आपको यह लेख जरुर पसंद आया होगा और हमे उमीद है की इस लेख की सहायता से आपको premchand ka jivan parichay बिल्कुल अच्छे से समझ में आ गया होगा। अगर आपके मन में इस लेख से सम्बंधित कोई सवाल हो तो, आप हमे नीचे कमेंट करके पुछ सकते है। और साथ ही इस premchand ki jeevani को आप अपने मित्र एवं सहपाठी के साथ शेयर जरुर करे।

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