भ्रष्टाचार पर निबंध : 100, 150, 200 एवं 1500 शब्दों में | Bhrashtachar Par Nibandh

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इस लेख में हम भ्रष्टाचार पर निबंध को एकदम विस्तार से देखेंगे। यदि आप कक्षा 5 से 8 तक के छात्र हैं, तो आपके लिए यह bhrashtachar par nibandh बहुत ही मददगार साबित हो सकता है, क्योंकि छोटी कक्षाओं के छात्रों को अक्सर उनके स्कूल से भ्रष्टाचार पर निबंध लिखने का होमवर्क मिलता है। और अगर आपको भी आपके स्कूल से इस तरह का होमवर्क मिला है, तो आप इस लेख में दिये गए bhrashtachar par nibandh की मदद से अपना होम वर्क बड़े ही आसानी से पूरा कर सकते हैं।

इसके अलावा अगर आप बोर्ड के परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों में से हैं, तो यह निबंध आपके भी लिए काफी महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है। क्योंकि बोर्ड परीक्षा में हिंदी के विषय में निबंध पूछे जाते हैं, जिनमें से भ्रष्टाचार पर भी निबंध पूछा जा सकता है। ऐसे में अगर आप इस निबंध को अच्छे से पढ़े रहेंगे, तो आपको अपने बोर्ड की परीक्षा में हिन्दी के विषय में अच्छे अंक प्राप्त करने में असानी होगी।

साथ ही कई बार कॉलेज, यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले छात्रों से प्रोजेक्ट कार्य में भ्रष्टाचार पर नोट्स या निबंध लिखने को कहा जाता है। तो ऐसे में अगर आप भी कॉलेज में पढ़ रहे हैं और आपको प्रोजेक्ट कार्य में भ्रष्टाचार पर निबंध लिखना है, तो आप इस आर्टिकल की मदद से अपना प्रोजेक्ट वर्क पूरा कर सकते हैं। तो चलिए अब हम essay on corruption in hindi को बिल्कुल विस्तार से देखें।


भ्रष्टाचार पर निबंध 2023 (Essay On Corruption In Hindi)

यहा पर इस निबंध में हम (भ्रष्टाचार) से संबंधित उन सभी महत्त्वपूर्ण प्रश्नों को देखेंगे जो परीक्षाओं के लिये इम्पोर्टेन्ट है जैसे की- भ्रष्टाचार क्या है, भ्रष्टाचार के कारण, भ्रष्टाचार दूर करने के उपाय, भ्रष्टाचार के विविध रुप आदि। इन सभी प्रश्नों को हम इस निबंध के माध्यम से बिल्कुल विस्तार से समझेंगे।

भ्रष्टाचार पर निबंध 1500 शब्दों में (Corruption Essay In Hindi)

▪︎ प्रस्तावना
▪︎ भ्रष्टाचार के विविध रूप
▪︎ भ्रष्टाचार के कारण
▪︎ भ्रष्टाचार दूर करने के उपाय
▪︎ निष्कर्ष

प्रस्तावना : भ्रष्टाचार देश की सम्पत्ति का आपराधिक दुरुपयोग है। 'भ्रष्टाचार' का अर्थ है - 'भ्रष्ट आचरण' अर्थात् नैतिकता और कानून के विरुद्ध आचरण। जब व्यक्ति को न तो अन्दर की लज्जा या धर्माधर्म का ज्ञान रहता है (जो अनैतिकता है) और न बाहर का डर रहता है (जो कानून की अवहेलना है) तो वह संसार में जघन्य-से-जघन्य पाप कर सकता है, अपने देश, जाति व समाज को बड़ी-से-बड़ी हानि पहुँचा सकता है, यहाँ तक कि मानवता को भी कलंकित कर सकता है। दुर्भाग्य से आज भारत इस भ्रष्टाचाररूपी सहस्त्रों मुख वाले दानव के जबड़ों में फँसकर तेजी से विनाश की ओर बढ़ता जा रहा है। अतः इस दारुण समस्या के कारणों एवं समाधान पर विचार करना आवश्यक है।

भ्रष्टाचार के विविध रूप

पहले किसी घोटाले की बात सुनकर देशवासी चौंक जाते थे, आज नहीं चौंकते। पहले घोटालों के आरोपी लोक-लज्जा के कारण अपना पद छोड़ देते थे, पर आज पकड़े जाने पर भी कुछ राजनेता इस शान से जेल जाते हैं; जैसे - वे किसी राष्ट्र सेवा के मिशन पर जा रहे हों। 'इसीलिए समूचे प्रशासन तन्त्र में भ्रष्ट आचरण धीरे-धीरे सामान्य बनता जा रहा है। आज भारतीय जीवन का कोई भी क्षेत्र सरकारी या गैर-सरकारी, सार्वजनिक या निजी- ऐसा नहीं, जो भ्रष्टाचार से अछूता हो। इसीलिए भ्रष्टाचार इतने अगणित रूपों में मिलता है कि उसे वर्गीकृत करना सरल नहीं है। फिर भी उसे मुख्यतः चार वर्गों में बाँटा जा सकता है। 1. राजनीतिक , 2. प्रशासनिक , 3. व्यावसायिक तथा 4. शैक्षणिक।

(1). राजनीतिक भ्रष्टाचार --- भ्रष्टाचार का सबसे प्रमुख रूप यही है जिसकी छत्रछाया में भ्रष्टाचार के शेष सारे रूप पनपते और संरक्षण पाते हैं। इसके अन्तर्गत मुख्यतः लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव जीतने के लिए अपनाया गया भ्रष्ट आचरण आता है। संसार में ऐसा कोई भी कुकृत्य, अनाचार या हथकण्डा नहीं है जो भारतवर्ष में चुनाव जीतने के लिए न अपनाया जाता हो। कारण यह है कि चुनावों में विजयी दल ही सरकार बनाता है, जिससे केन्द्र और प्रदेशों की सारी राजसत्ता उसी के हाथ में आ जाती है। इसलिए 'येन केन प्रकारेण' अपने दल को विजयी बनाना ही राजनीतिज्ञों का एकमात्र लक्ष्य बन गया है। इन राजनेताओं की शनि-दृष्टि ही देश में जातीय प्रवृत्तियों को उभारती एवं देशद्रोहियों को पनपाती है। देश की वर्तमान दुरावस्था के लिए ये भ्रष्ट राजनेता ही दोषी हैं। इनके कारण देश में अनेकानेक घोटाले हुए हैं।

(2). प्रशासनिक भ्रष्टाचार --- इसके अन्तर्गत सरकारी, अर्द्ध-सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं, संस्थानों, प्रतिष्ठानों या सेवाओं (नौकरियों) में बैठे वे सारे अधिकारी आते हैं जो जातिवाद, भाई-भतीजावाद, किसी प्रकार के दबाव या कामिनी-कांचन के लोभ या अन्यान्य किसी कारण से अयोग्य व्यक्तियों की नियुक्तियाँ करते हैं, उन्हें पदोन्नत करते हैं, स्वयं अपने कर्त्तव्य की अवहेलना करते हैं और ऐसा करने वाले अधीनस्थ कर्मचारियों को प्रश्रय देते हैं या अपने किसी भी कार्य या आचरण से देश को किसी मोर्चे पर कमजोर बनाते हैं। चाहे वह गलत कोटा-परमिट देने वाला अफसर हो या सेना के रहस्य विदेशों के हाथ बेचने वाला सेनाधिकारी या ठेकेदारों से रिश्वत खाकर शीघ्र ढह जाने वाले पुल, सरकारी भवनों आदि का निर्माण करने वाला इंजीनियर या अन्यायपूर्ण फैसले करने वाला न्यायाधीश या अपराधी को प्रश्रय देने वाला पुलिस अफसर, भी इसी प्रकार के भाचार के अन्तर्गत आते हैं।

(3). व्यावसायिक भ्रष्टाचार --- इसके अन्तर्गत विभिन्न पदार्थों में मिलावट करने वाले, घटिया माल तैयार करके बढ़िया के मोल बेचने वाले, निर्धारित दर से अधिक मूल्य वसूलने वाले, वस्तु-विशेष का कृत्रिम अभाव पैदा करके जनता को दोनों हाथों से लूटने वाले कर चोरी करने वाले तथा अन्यान्य भ्रष्ट तौर-तरीके अपनाकर देश और समाज को कमजोर बनाने वाले व्यवसायी आते हैं।

(4). शैक्षणिक भ्रष्टाचार --- शिक्षा जैसा पवित्र क्षेत्र भी भ्रष्टाचार के संक्रमण से अछूता नहीं रहा। अतः आज डिग्री से अधिक सिफारिश, योग्यता से अधिक चापलूसी का बोलबाला है। परिश्रम से अधिक बल धन में होने के कारण शिक्षा का निरन्तर पतन हो रहा है।

भ्रष्टाचार के कारण

भ्रष्टाचार की गति नीचे से ऊपर को न होकर ऊपर से नीचे को होती है अर्थात् भ्रष्टाचार सबसे पहले उच्चतम स्तर पर पनपता है और तब क्रमश: नीचे की ओर फैलता जाता है। कहावत है — 'यथा राजा तथा प्रजा'। इसका यह आशय कदापि नहीं कि भारत में प्रत्येक व्यक्ति भ्रष्टाचारी है। पर इसमें भी कोई सन्देह नहीं कि भ्रष्टाचार से मुक्त व्यक्ति इस देश में अपवादस्वरूप ही मिलते हैं। कारण है वह भौतिकवादी जीवन-दर्शन, जो अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से पश्चिम से आया है। यह जीवन पद्धति विशुद्ध भोगवादी है – 'खाओ, पिओ और मौज करो' ही इसका मूलमन्त्र है। यह परम्परागत भारतीय जीवन-दर्शन के पूरी तरह विपरीत है। भारतीय मनीषियों ने चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि को ही मानव-जीवन का लक्ष्य बताया है। मानव धर्मपूर्वक अर्थ और काम का सेवन करते हुए मोक्ष अधिकारी बनता है। पश्चिम में धर्म और मोक्ष को कोई जानता तक नहीं। वहाँ तो बस अर्थ (धन-वैभव) और काम (सांसारिक सुख- भोग या विषय- वासनाओं की तृप्ति) ही जीवन का परम पुरुषार्थ माना जाता है। पश्चिम में जितनी भी वैज्ञानिक प्रगति हुई है, उस सबका लक्ष्य भी मनुष्य के लिए सांसारिक सुख- भोग के साधनों का अधिकाधिक विकास ही है।

भ्रष्टाचार दूर करने के उपाय

भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय अपनाये जाने चाहिए 

(1). प्राचीन भारतीय संस्कृति को प्रोत्साहन

जब तक अंग्रेजी शिक्षा के माध्यम से भोगवादी पाश्चात्य संस्कृति प्रचारित होती रहेगी, भ्रष्टाचार कम नहीं हो सकता। अत : सबसे पहले देशी भाषाओं , विशेषतः संस्कृत, की शिक्षा अनिवार्य करनी होगी। भारतीय भाषाएँ जीवन-मूल्यों की प्रचारक और पृष्ठपोषक हैं। उनसे भारतीयों में धर्म का भाव सुदृढ़ होगा और लोग धर्मभीरु बनेंगे।

(2). चुनाव प्रक्रिया में परिवर्तन

वर्तमान चुनाव-पद्धति के स्थान पर ऐसी पद्धति अपनानी पड़ेगी, जिसमें जनता स्वयं अपनी इच्छा से भारतीय जीवन-मूल्यों के प्रति समर्पित ईमानदार व्यक्तियों को खड़ा करके बिना धन व्यय के चुन सके। ऐसे लोग जब विधायक या संसद सदस्य बनेंगे तो ईमानदारी और देशभक्ति का आदर्श जनता के सामने रखकर स्वच्छ शासन-प्रशासन दे सकेंगे। अपराधी प्रवृत्ति के लोगों को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए और जो विधायक या सांसद अवसरवादिता के कारण दल बदलें, उनकी सदस्यता समाप्त कर पुन: चुनाव में खड़े होने की व्यवस्था पर रोक लगानी होगी। जाति और धर्म के नाम का सहारा लेकर वोट माँगने वालों को चुनाव प्रक्रिया से ही प्रतिबन्धित कर दिया जाना चाहिए। जब चपरासी और चौकीदारों के लिए भी योग्यता निर्धारित होती है, तब विधायकों और सांसदों के लिए क्यों नहीं ? 

(3). अस्वाभाविक प्रतिबन्धों की समाप्ति

सरकार ने कोटा-परमिट आदि के जो हजारों प्रतिबन्ध लगा रखे हैं, उनसे व्यापार बहुत कुप्रभावित हुआ है। फलतः व्यापारियों को विभिन्न विभागों में बैठे अफसरों को खुश करने के लिए भाँति-भाँति के भ्रष्ट हथकण्डे अपनाने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में भले और ईमानदार लोग व्यापार की ओर उन्मुख नहीं हो पाते। इन प्रतिबन्धों की समाप्ति से व्यापार में योग्य लोग आगे आएँगे, जिससे स्वस्थ प्रतियोगिता को बढ़ावा मिलेगा और जनता को अच्छा माल सस्ती दर पर मिल सकेगा।

(4). कर लगा कर प्रणाली का सरलीकरण

सरकार ने हजारों प्रकार रखे हैं, जिनके बोझ से व्यापार पनप नहीं पाता। फलतः व्यापारी को अनैतिक हथकण्डे अपनाने को विवश होना पड़ता है; अतः सरकार को सैकड़ों करों को समाप्त करके कुछ गिने-चुने कर ही लगाने चाहिए। इन करों की वसूली प्रक्रिया भी इतनी सरल और निर्भ्रान्त हो कि अशिक्षित या अल्पशिक्षित व्यक्ति भी अपना कर सुविधापूर्वक जमा कर सके और भ्रष्ट तरीके अपनाने को बाध्य न हो। इसके लिए देशी भाषाओं का हर स्तर पर प्रयोग नितान्त वांछनीय है।

(5). शासन और प्रशासन व्यय में कटौती

आज देश के शासन और प्रशासन (जिसमें विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास भी सम्मिलित हैं), पर इतना अन्धाधुन्ध व्यय हो रहा है कि जनता की कमर टूटती जा रही है। इस व्यय में तत्काल बहुत अधिक कटौती करके सर्वत्र सादगी का आदर्श सामने रखा जाना चाहिए, जो प्राचीनकाल से ही भारतीय जीवन पद्धति की विशेषता रही है। साथ ही केन्द्रीय और प्रादेशिक सचिवालयों तथा देश-भर के प्रशासनिक तन्त्र के बेहद भारी-भरकम ढाँचे को छाँटकर छोटा किया जाना चाहिए। 

(6). देशभक्ति की प्रेरणा देना

सबसे महत्त्वपूर्ण है कि वर्तमान शिक्षा- पद्धति में आमूल- चूल परिवर्तन कर उसे देशभक्ति को केन्द्र में रखकर पुनर्गठित किया जाए। विद्यार्थी को, चाहे वह किसी भी धर्म, मत या सम्प्रदाय का अनुयायी हो, आरम्भ से ही देशभक्ति का पाठ पढ़ाया जाए। इसके लिए प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति, भारतीय महापुरुषों के जीवनचरित आदि पाठ्यक्रम में रखकर विद्यार्थी को अपने देश की मिट्टी, इसकी परम्पराओं, मान्यताओं एवं संस्कृति पर गर्व करना सिखाया जाना चाहिए।

(7). कानून को अधिक कठोर बनाना

भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानून को भी अधिक कठोर बनाया जाए। इसके लिए वर्षों से चर्चा का विषय बना 'लोकपाल विधेयक' भी भारत जैसे देश; जहाँ प्रत्येक स्तर पर भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारी ही व्याप्त हैं; के लिए नाकाफी ही है।

(8). भ्रष्ट व्यक्तियों का सामाजिक बहिष्कार

भ्रष्टाचार से किसी भी रूप में सम्बद्ध व्यक्तियों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए, अर्थात् लोग उनसे किसी भी प्रकार का सम्बन्ध न रखें। यह उपाय भ्रष्टाचार रोकने में बहुत सहायक सिद्ध होगा।

निष्कर्ष

भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे को आता है, इसलिए जब तक राजनेता देशभक्त और सदाचारी न होंगे, भ्रष्टाचार का उन्मूलन असम्भव है। उपयुक्त राजनेताओं के चुने जाने के बाद ही पूर्वोक्त सारे उपाय अपनाये जा सकते हैं, जो भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ने में पूर्णतः प्रभावी सिद्ध होंगे। आज हर एक की जबान पर एक ही प्रश्न है कि क्या होगा इस महान् -सनातन राष्ट्र का ? कैसे मिटेगा यह भ्रष्टाचार, अत्याचार और दुराचार ? यह तभी सम्भव है, जब चरित्रवान् तथा सर्वस्व-त्याग और देश-सेवा की भावना से भरे लोग राजनीति में आएँगे और लोकचेतना के साथ जीवन को जोड़ेंगे।

भ्रष्टाचार पर निबंध 100 शब्दों में

आजकल के समाज में, भ्रष्टाचार एक परिचित शब्द है। इसका मतलब होता है कि सत्ता में बैठे लोग बेईमानी करके बड़ी चीजें करते हैं। इसका मूल कारण पारदर्शिता की कमी, लालच और ऊपरी अधिकारियों की अनुमति की कमी होती है। भारत में, महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहां भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी समस्या है। यह समस्या हमारे देश को बहुत कठिनाईयों में डाल देती है। हमने इसे रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं, जैसे कि सूचना का अधिकार अधिनियम, लोक सेवा का अधिकार कानून, भ्रष्टाचार विरोधी कानून, भ्रष्टाचार विरोधी पुलिस और अदालतें, नागरिक भ्रष्टाचार विरोधी संगठन और चुनाव सुधार। अगर हम इस समस्या का समाधान नहीं करते, तो यह हमारे देश के भविष्य को प्रभावित कर सकती है।

भ्रष्टाचार पर निबंध 150 शब्दों में

भ्रष्टाचार को रिश्वतखोरी, सार्वजनिक पद का दुरुपयोग और किसी व्यक्ति की आध्यात्मिक इच्छाओं के स्वार्थी उद्देश्यों के लिए सत्ता का दुरुपयोग के रूप में परिभाषित किया गया है। आजकल आम चर्चाओं में भ्रष्टाचार का विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसका संबंध मुख्य रूप से व्यक्ति की बढ़ती आध्यात्मिक इच्छाओं से है। लोग पैसा कमाने के लिए स्व-सात का रास्ता चुन रहे हैं, जिससे भ्रष्टाचार बढ़ रहा है।

समाज में बढ़ते इस भ्रष्टाचार से लड़ने की हम सभी को जरूरत है। राजनेताओं को भी इसमें शामिल होना चाहिए और भ्रष्टाचार के खिलाफ साहसिक कदम उठाने चाहिए, चाहे वे वामपंथी हों या दक्षिणपंथी। ऐसे नेताओं का समर्थन कभी नहीं करना चाहिए जो अवैध तरीकों का फायदा उठाते हैं। हम सभी को भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने का संकल्प लेना चाहिए, ताकि हम समाज को स्वस्थ और मजबूत बना सकें।

भ्रष्टाचार पर निबंध 200 शब्दों में

भारत में भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है जिसका समाज में बड़ा प्रभाव हो रहा है। यह सभी लोगों को परेशान करता है, चाहे वो गरीब हों या अमीर। इसके विभिन्न तरीकों में होते हैं जैसे कि रिश्वत, ग़ैरकानूनी काम, और लोगों का सार्वजनिक संसाधनों का गलत इस्तेमाल। इसकी मुख्य वजह पारदर्शिता, सजगता की कमी और कमजोर कानूनी प्रणाली है।

इससे हमारे समाज और आर्थिक विकास पर बुरा प्रभाव पड़ता है। संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पाता, सरकारी कामों में बुरा प्रबंधन होता है और लोगों को सही सेवाएं नहीं मिल पाती। यह लोकतंत्र और कानून को भी कमजोर करता है, क्योंकि राजनीतिक लोग इसका उपयोग अपने सामर्थन में बनाए रखने के लिए करते हैं।

इस समस्या का समाधान करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जैसे कि भ्रष्टाचार विरोधी एजेंसियों की स्थापना, सजगता और जवाबदेही की प्रोत्साहना देना, और सार्वजनिक सेवाओं में पारदर्शिता को बढ़ावा देना। हालांकि, यह एक बड़ी चुनौती है, इसके लिए हमें मिलकर प्रयास करने की आवश्यकता है। लोगों को भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने, सुरक्षित माध्यमों से रिपोर्ट करने और नेताओं से जवाबदेही मांगने में भाग लेने की आवश्यकता है। इस समस्या का समाधान पाने के लिए सरकार, समाज, और लोगों के सहयोग से एक मिलकर प्रयास की आवश्यकता है।

भ्रष्टाचार पर निबंध Pdf

नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके आप भ्रष्टाचार पर निबंध का पीडीएफ फ़ाईल डाउनलोड कर सकते हैं। और इस PDF की सहायता से आप कभी भी अपने समयानुसार बिना इंटरनेट के (corruption essay) को पढ़ सकते हैं।


अंतिम शब्द

यहा पर इस लेख में हमने एकदम विस्तार से भ्रष्टाचार पर निबंध को देखा। यह निबंध, कक्षा 5 से 12 तक के स्टूडेंट्स, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्र और कॉलेज में पढ़ रहे विद्यार्थियों के लिये उपयोगी है। छात्रो की सुविधा के लिए हमने भ्रष्टाचार पर निबंध 100, 150 और 200 शब्दों में भी शेयर किया है, जिस छात्र को जितने शब्दों में Bhrashtachar Par Nibandh की आवश्यकता है, वो उतने शब्दों में पढ़ सकता है।

यहा पर शेयर किया गया Essay On Bhrashtachar In Hindi आपको कैसा लगा, कमेंट के जरिये आप अपना सुझाव हमारे साथ जरुर साझा करें। हम आशा करते है की आपको यह निबंध जरुर पसंद आया होगा। और हमे उमीद है की इस लेख की सहायता से भ्रष्टाचार पर निबंध कैसे लिखें आप बिल्कुल अच्छे से समझ गए होंगे। यदि आपके मन में इस लेख को लेकर कोई सवाल है, तो आप नीचे कमेंट करके पुछ सकते हैं। और साथ ही इस निबंध को आप अपने सभी मित्रों के साथ शेयर भी जरुर करे। 

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