शहीद भगत सिंह का जीवन परिचय | Bhagat Singh Biography In Hindi

Bhagat Singh Biography In Hindi

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शहीद भगत सिंह की जीवनी (Bhagat Singh Biography In Hindi)

देशप्रेम से ओत-प्रोत व्यक्ति हमेशा अपने देश के प्रति कर्त्तव्यों के पालन हेतु न केवल तत्पर रहता है, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर अपने प्राण न्योछावर करने से भी पीछे नहीं हटता। स्वतन्त्रता से पूर्व का हमारे देश का इतिहास ऐसे ही देशभक्तों की वीरतापूर्ण गाथाओं से भरा है, जिनमें भगतसिंह का नाम स्वत: ही युवाओं के दिलों में देशभक्ति एवं जोश की भावना पैदा कर देता है।

स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर स्वयं को कुर्बान कर उन्होंने भारत में न केवल क्रान्ति की एक लहर पैदा की, बल्कि अंग्रेज़ी साम्राज्य के अन्त की शुरुआत भी कर दी थी यही कारण है कि भगतसिंह आज तक अधिकतर भारतीय युवाओं के आदर्श बने हुए हैं और अब तो भगतसिंह का नाम क्रान्ति का पर्याय बन चुका है। भगतसिंह अपने जीवनकाल में ही अत्यधिक प्रसिद्ध एवं युवाओं के आदर्श बन चुके थे। उनकी प्रसिद्धि से प्रभावित होकर पट्टाभि सीतारमैया ने कहा था - "यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि भगतसिंह का नाम भारत में उतना ही लोकप्रिय है, जितना कि गाँधीजी का।"

नाम अमर शहीद भगत सिंह
जन्म स्थान बंगा नामक गाँव (लायलपुर)
जन्म तिथि 27 सितम्बर 1907
मृत्यु तिथि 23 मार्च 1931
आयु मृत्यु के समय 23 वर्ष
पिता का नाम किशन सिंह संधू
माता का नाम विद्यावती कौर
भाई का नाम रणबीर सिंह, कुलतार सिंह, कुलबीर सिंह, जगत सिंह, राजिंदर सिंह
बहन का नाम प्रकाश कौर, अमर कौर, शकुंतला

भगत सिंह का जीवन परिचय (Bhagat Singh Ka Jivan Parichay)

भगतसिंह का जन्म 27 सितम्बर, 1907 को पंजाब के ज़िला लायलपुर में बंगा नामक गाँव में एक देशभक्त सिख परिवार हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। भगतसिंह के पिता सरदार किशन सिंह एवं उनके चाचा अजीत सिंह तथा स्वर्ण सिंह अंग्रेज़ों के विरुद्ध होने के कारण जेल में बन्द थे। जिस दिन भगतसिंह का जन्म हुआ था, उसी दिन उनके पिता एवं चाचा जेल से रिहा हुए थे, इसलिए उनकी दादी ने उन्हें अच्छे भाग्य वाला मानकर उनका नाम भगतसिंह रख दिया था। देशभक्त परिवार में जन्म लेने के कारण भगतसिंह को बचपन से ही देशभक्ति और स्वतन्त्रता का पाठ पढ़ने को मिला।

भगतसिंह की प्रारम्भिक शिक्षा उनके गाँव में ही हुई। प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्हें वर्ष 1916-17 में लाहौर के डीएवी स्कूल में भर्ती कराया गया। रॉलेट एक्ट के विरोध में सम्पूर्ण भारत में जगह-जगह प्रदर्शन किए जाने के दौरान 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग हत्याकाण्ड में हज़ारों निर्दोष भारतीय मारे गए। इस नरसंहार की पूरे देश में भर्त्सना की गई। इस काण्ड का समाचार सुनकर भगतसिंह लाहौर से अमृतसर पहुँचे और जलियाँवाला बाग की मिट्टी एक बोतल में भरकर अपने पास रख ली, ताकि उन्हें याद रहे कि देश के इस अपमान का बदला उन्हें अत्याचारी अंग्रेज़ों से लेना है।

भगत सिंह की क्रान्तिकारी भूमिका

वर्ष 1920 में जब महात्मा गाँधी ने असहयोग आन्दोलन की घोषणा की, तब भगतसिंह ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और देश के स्वतन्त्रता संग्राम में कूद गए। लाला लाजपत राय ने लाहौर में जब नेशनल कॉलेज की स्थापना की, तो भगतसिंह भी इसमें दाखिल हो गए। इसी कॉलेज में वे यशपाल, सुखदेव, तीर्थराम एवं झण्डासिंह जैसे क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में आए। भगतसिंह ने आत्मकथा 'दि डोर टु डेथ' , 'आइडियल ऑफ़ सोशलिज़्म' , 'स्वाधीनता की लड़ाई में पंजाब का पहला उभार' तथा 'मैं नास्तिक क्यों हूँ' नामक कृतियों की रचना की।

वर्ष 1928 में साइमन कमीशन जब भारत आया, तो लोगों ने इसके विरोध में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला। इस जुलूस में लोगों की भीड़ बढ़ती जा रही थी। इतने व्यापक विरोध को देखकर सहायक अधीक्षक साण्डर्स बौखला गया और उसने भीड़ पर लाठीचार्ज करवा दिया। इस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय इतनी बुरी तरह घायल हो गए कि 17 नवम्बर, 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। यह खबर भगतसिंह के लिए किसी आघात से कम नहीं थी, उन्होंने तुरन्त लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने का फैसला कर लिया और राजगुरु, सुखदेव एवं चन्द्रशेखर आजाद के साथ मिलकर साण्डर्स की हत्या की योजना बनाई। भगतसिंह की योजना से अन्ततः सबने मिलकर 17 दिसम्बर, 1928 को साण्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी। इस घटना ने भगतसिंह को पूरे देश में लोकप्रिय क्रान्तिकारी के रूप में प्रसिद्ध कर दिया।

भगतसिंह नौजवान भारत सभा, कीर्ति किसान पार्टी तथा हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन से सम्बन्धित थे। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन की केन्द्रीय कार्यकारिणी की सभा ने जब पब्लिक सेफ्टी बिल एवं डिस्प्यूट बिल का विरोध करने के लिए केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंकने का प्रस्ताव पारित किया, तो इस कार्य की जिम्मेदारी भगतसिंह ने ले ली। असेम्बली में बम फेंकने का उनका उद्देश्य केवल विरोध जताना था, इसलिए बम फेंकने के बाद कोई भी क्रान्तिकारी वहाँ से भागा नहीं। भगतसिंह सहित सभी क्रान्तिकारियों को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया।

इस गतिविधि में भगतसिंह के सहायक बने बटुकेश्वर दत्त को 12 जून, 1929 को सेशंस जज ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा -307 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा-3 के अन्तर्गत आजीवन कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद अंग्रेज़ शासकों ने भगतसिंह एवं बटुकेश्वर दत्त को नए सिरे से फँसाने की कोशिश शुरू की। अदालत की कार्यवाही कई महीनों तक चलती रही। 26 अगस्त, 1930 को अदालत का कार्य लगभग पूरा हो गया। अदालत ने 7 अक्टूबर, 1930 को 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगतसिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फाँसी की सजा निश्चित की गई थी। इस निर्णय के विरुद्ध नवम्बर, 1930 में प्रिवी काउंसिल में अपील दायर की गई, किन्तु यह अपील भी 10 जनवरी, 1931 को रद्द कर दी गई।

भगत सिंह की मृत्यु कब हुई

भगतसिंह को फाँसी की सजा सुनाए जाने के बाद से पूरे देश में क्रान्ति की एक अनोखी लहर उत्पन्न हो गई थी। क्रान्ति की इस लहर से अंग्रेज सरकार डर गई। फाँसी का समय 24 मार्च, 1931 निर्धारित किया गया था, किन्तु सरकार ने जनता की क्रान्ति के डर से कानून के विरुद्ध जाते हुए 23 मार्च को ही सायंकाल (7.33) बजे उन्हें फाँसी देने का निश्चय किया। जेल अधीक्षक जब फाँसी लगाने के लिए भगतसिंह को लेने उनकी कोठरी में गए, तो उस समय वे 'लेनिन का जीवन चरित्र' पढ़ रहे थे।

जेल अधीक्षक ने उनसे कहा, "सरदार जी, फाँसी का वक्त हो गया है, आप तैयार हो जाइए।" इस बात पर भगतसिंह ने कहा- "ठहरो , एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से मिल रहा है।" जेल अधीक्षक आश्चर्यचकित होकर उन्हें देखता रह गया। वह किताब पूरी करने के बाद वे उसके साथ चल दिए। उसी समय सुखदेव एवं राजगुरु को भी फाँसी स्थल पर लाया गया। तीनों को एक साथ फाँसी दे दी गई। फाँसी देने के बाद रात के अंधेरे में ही अन्तिम संस्कार कर दिया गया। उन तीनों को जब फाँसी दी जा रही थी उस समय तीनों एक सुर में गा रहे थे

"दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उल्फ़त
मेरी मिट्टी से भी खुशबू - ए - वतन आएगी।" 

अंग्रेज़ सरकार ने भगतसिंह को फाँसी देकर समझ लिया था कि उन्होंने उनका जीवन समाप्त कर दिया, परन्तु यह उनकी भूल थी। भगतसिंह अपना बलिदान देकर अंग्रेज़ी साम्राज्य की समाप्ति का अध्याय शुरू कर चुके थे। भगतसिंह जैसे लोग कभी मरते नहीं, वे अत्याचार के विरुद्ध हर आवाज़ के रूप में ज़िन्दा रहेंगे और युवाओं का मार्गदर्शन करते रहेंगे। उनका नारा 'इन्कलाब ज़िन्दाबाद' सदा युवाओं के दिल में जोश भरता रहेगा।

भगत सिंह का जीवन परिचय PDF

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निष्कर्ष

इस लेख में हमने biography of bhagat singh in hindi को एकदम विस्तार से समझा। हमने इस लेख में भगत सिंह के जीवन से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण सवालों के जवाब को जाना जैसे की भगत सिंह का जन्म कहां और कब हुआ, भगत सिंह की उम्र कितनी थी, भगत सिंह के कितने भाई थे और भगत सिंह की मृत्यु कब हुई आदि। ऐसे ही भगत सिंह के जीवन से जड़े बहुत से प्रश्नो के उत्तर को इस लेख में हमने आपके साथ एकदम विस्तार से शेयर किया, जिससे की आपको भगत सिंह की जीवनी को अच्छे से समझने में काफी असानी हुई होगी।

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