अर्थालंकार किसे कहते हैं ? परिभाषा और भेद | Arthaalankar Kise Kahate Hain

Arthaalankar Kise Kahate Hain

इस आर्टिकल में हम अलंकार के दुसरे भाग यानी अर्थालंकार के बारे में विस्तार से समझेंगे। (अलंकार) के बारे में हमने पहले ही विस्तार से आर्टिकल लिखा है जिसमे हमने अलंकार से सम्बंधीत कई महत्वपुर्ण प्रश्नो को समझा है, यदि आपने उस आर्टिकल को अभी नही पढ़ा तो, आप उसे जरुर पढ़े जिससे की आपको अलंकार अच्छे से समझ आ जाए। और यहा इस आर्टिकल में हम arthaalankar in hindi से सम्बन्धित सभी महत्वपुर्ण पश्नो को समझेंगे। जैसे की अर्थालंकार किसे कहते हैं, अर्थालंकार की परिभाषा, अर्थालंकार के भेद आदि इन सभी प्रश्नो के उत्तर आपको यहा पर विस्तार से मिल जायेंगे। अगर आपको अर्थालंकार अच्छे से समझना है तो, इस आर्टिकल को शुरू से अन्त तक पढ़े। चलिये विस्तार से समझे की arthaalankar kise kahate hain


अर्थालंकार किसे कहते हैं (Arthaalankar Kise Kahate Hain)

परिभाषा -- साहित्य में अर्थगत चमत्कार को अर्थालंकार कहते हैं। अथवा जहाँ शब्दों के अर्थ से चमत्कार स्पष्ट हो, वहाँ अर्थालंकार माना जाता है।

पहचान -- अलंकारिक शब्दों के स्थान पर उनके पर्यायवाची प्रयोग करने पर अलंकार ज्यों का त्यों बना रहता है।

अर्थालंकार कितने प्रकार के होते है (Arthaalankar Kitane Prakar Ke Hote Hain)

अर्थालंकार की परिभाषा और पहचान को अभी हमने अच्छे से समझ लिया। अब हम अर्थालंकार कितने प्रकार मे होते है इसके बारे में समझते है तो, प्रमुख अर्थालंकार मुख्य रुप से तेरह हैं। यानी की अर्थालंकार 13 प्रकार के होते है। 

(1). उपमा
(2). रूपक
(3). उत्प्रेक्षा
(4). भ्रान्तिमान
(5). सन्देह
(6). अतिशयोक्ति
(7). दृष्टान्त
(8). विभावना
(9). अन्योक्ति
(10). विरोधाभास
(11). विशेषोक्ति
(12). प्रतीप
(13). अर्थान्तरन्यास

1). उपमा

परिभाषा -- जहाँ एक वस्तु या प्राणी की तुलना अत्यंत सादृश्य के कारण प्रसिद्ध वस्तु या प्राणी से की जाए, वहाँ उपमा अलंकार होता है। अथवा समान धर्म के आधार पर जहाँ एक वस्तु की समानता या तुलना किसी दूसरी वस्तु से की जाती है, वहाँ उपमा अलंकार होता है। उपमा के चार अंग हैं 

(i) उपमेय --- वर्णनीय वस्तु जिसकी उपमा या समानता दी जाती है, उसे 'उपमेय' कहते हैं; जैसे -- उसका मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है। वाक्य में 'मुख' की चन्द्रमा से समानता बताई गई है, अतः मुख उपमेय है। 

(ii) उपमान --- जिससे उपमेय की समानता या तुलना की जाती है उसे उपमान कहते हैं; जैसे -- उपमेय (मुख) की समानता चन्द्रमा से की गई है, अतः चन्द्रमा उपमान है।

(iii) साधारण --- धर्म जिस गुण के लिए उपमा दी जाती है, उसे साधारण धर्म कहते हैं। उक्त उदाहरण में सुन्दरता के लिए उपमा दी गई है, अतः सुन्दरता साधारण धर्म है।

(iv) वाचक --- शब्द जिस शब्द के द्वारा उपमा दी जाती है, उसे वाचक शब्द कहते हैं। उपर्युक्त उदाहरण में समान शब्द वाचक है। इसके अलावा 'सी' , 'सम' , 'सरिस' सदृश शब्द उपमा वाचक होते हैं। उपमा के तीन भेद हैं — पूणोंपमा, लुप्तोपमा और मालोपमा। 

(क) पूर्णोपमा --- जहाँ उपमा के चारों अंग विद्यमान हों वहाँ पूर्णोपमा अलंकार होता है; जैसे -- "हरिपद कोमल कमल से" 

(ख) लुप्तोपमा --- जहाँ उपमा के एक या अनेक अंगों का अभाव हो वहाँ लुप्तोपमा अलंकार होता है; जैसे --
"पड़ी थी बिजली-सी विकराल। 
लपेटे थे घन जैसे बाल"।।

(ग) मालोपमा --- जहाँ किसी कथन में एक ही उपमेय के अनेक उपमान होते हैं वहाँ मालोपमा अलंकार होता है; जैसे --
"न्द्रमा-सा कान्तिमय, मृदु कमल-सा कोमल महा।
कुसुम-सा हँसता हुआ, प्राणेश्वरी का मुख रहा।"

2). रूपक

परिभाषा -- जहाँ गुण की अत्यन्त समानता के कारण उपमेय में उपमान का अभेद आरोपण हो, वहाँ रूपक अलंकार में होता है। अथवा जहाँ उपमेय में उपमान का निषेधरहित आरोप हो अर्थात् उपमेय और उपमान को एक रूप कह दिया जाए, वहाँ रूपक अलंकार होता है; जैसे --
"बीती विभावरी जाग री।
अम्बर-पनघट में डुबो रही तारा-घट ऊषा नागरी"।

यहाँ अम्बर-पनघट, तारा-घट, ऊषा नागरी में उपमेय उपमान एक हो गए हैं, अत: रूपक अलंकार है।

गुरु पद कमल बंदौ हरि राई।

यहाँ गुरु पद (उपमेय) में कमल (उपमान) का आरोप होने से रूपक अलंकार है।

3). उत्प्रेक्षा

परिभाषा -- जहाँ समानता के कारण उपमेय में संभावना या कल्पना की जाए वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। अथवा जहाँ उपमेय में उपमान की सम्भावना व्यक्त की जाए वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। इसमें जनु, मनु, मानो, जानो, इव, जैसे वाचक शब्दों का प्रयोग होता है। उत्प्रेक्षा के तीन भेद हैं — वस्तूत्प्रेक्षा, हेतूत्प्रेक्षा और फलोत्प्रेक्षा

(i) वस्तूत्प्रेक्षा --- जहाँ एक वस्तु में दूसरी वस्तु की सम्भावना की जाए वहाँ वस्तुत्प्रेक्षा होती है; जैसे --
"उसका मुख मानो चन्द्रमा है।" 

(ii) हेतूत्प्रेक्षा --- जब किसी कथन में अवास्तविक कारण को कारण मान लिया जाए तो हेतृत्प्रेक्षा होती है; जैसे --
"पिउ सो कहेव सन्देसड़ा, हे भौंरा हे काग।
सो धनि विरही जरिमुई, तेहिक धुवाँ हम लाग"।।

यहाँ कौआ और भ्रमर के काले होने का वास्तविक कारण विरहिणी के विरहाग्नि में जल कर मरने का धुवाँ नहीं हो सकता है फिर भी उसे कारण माना गया है अतः हेतूत्प्रेक्षा अलंकार है।

(iii) फलोत्प्रेक्षा --- जहाँ अवास्तविक फल को वास्तविक फल मान लिया जाए, वहाँ फलोत्प्रेक्षा होती है; जैसे --
"नायिका के चरणों की समानता प्राप्त करने के लिए कमल जल में तप रहा है।"

यहाँ कमल का जल में तप करना स्वाभाविक है। चरणों की समानता प्राप्त करना वास्तविक फल नहीं है पर उसे मान लिया गया है, अतः यहाँ फलोत्प्रेक्षा है।

4). भ्रान्तिमान

परिभाषा -- जहाँ समानता के कारण एक वस्तु में किसी दूसरी वस्तु का भ्रम हो, वहाँ भ्रान्तिमा अलंकार होता है; जैसे --
"पायँ महावर देन को नाइन बैठी आय।
फिरि-फिरि जानि महावरी, एडी मीड़ति जाय।।"

यहाँ नाइन को एड़ी की स्वाभाविक लालिमा में महावर की काल्पनिक प्रतीति हो रही है, अतः यहाँ भ्रान्तिमान अलंकार हैं।

5). सन्देह

परिभाषा -- जहाँ अति सादृश्य के कारण उपमेय और उपमान में अनिश्चय की स्थिति बनी रहे अर्थात् जब उपमेय में अन्य किसी वस्तु का संशय उत्पन्न हो जाए, तो वहाँ सन्देह अलंकार होता है; जैसे --
"सारी बीच नारी है या नारी बीच सारी है,
कि सारी की नारी है कि नारी की ही सारी।" 

यहाँ उपमेय में उपमान का संशयात्मक ज्ञान है अतः यहाँ सन्देह अलंकार है।

6). दृष्टान्त

परिभाषा -- जहाँ उपमेय और उपमान तथा उनके साधारण धर्मो में बिम्ब- प्रतिबिम्ब भाव हो, दृष्टान्त अलंकार होता है। अथवा जहाँ किसी बात को स्पष्ट करने के लिए सादृश्यमूलक दृष्टान्त प्रस्तुत किया जाता है, वहाँ दृष्टान्त अलंकार होता है; जैसे --
"मन मलीन तन सुन्दर कैसे।
विषरस भरा कनक घट जैसे।।"

यहाँ उपमेय वाक्य और उपमान वाक्य में बिम्ब-प्रतिबिम्ब का भाव है अतः यहाँ दृष्टान्त अलंकार है।

7). अतिशयोक्ति

परिभाषा -- जहाँ उपमेय का वर्णन लोक सीमा से बढ़कर किया जाए वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है। अथवा जहाँ किसी विषयवस्तु का उक्ति चमत्कार द्वारा लोकमर्यादा के विरुद्ध बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया जाता है, वहाँ अतिशयोक्ति अलंकार होता है।
जैसे --
"हनुमान की पूँछ में, लगन न पाई आग।
सारी लंका जरि गई, गए निशाचर भाग।"

यहाँ हनुमान की पूँछ में आग लगने के पहले ही सारी लंका का जलना और राक्षसों के भागने का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन होने से अतिशयोक्ति अलंकार है।

8). विभावना

परिभाषा -- जहाँ कारण के बिना कार्य के होने का वर्णन हो, वहाँ विभावना अलंकार होता है; जैसे --
"बिनु पग चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करै विधि नाना।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी वक्ता बड़ जोगी।" 

यहाँ पैरों के बिना चलना, कानों के बिना सुनना, बिना हाथों के विविध कर्म करना, बिना मुख के सभी रस भोग करना और वाणी के बिना वक्ता होने का उल्लेख होने से विभावना अलंकार है।

9). अन्योक्ति

परिभाषा -- जहाँ किसी वस्तु या व्यक्ति को लक्ष्य कर कही जाने वाली बात दूसरे के लिए कही जाए, वहाँ अन्योक्ति अलंकार होता है; जैसे -- 
"नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास एहि काल।
अली कली ही सो बिंध्यौ, आगे कौन हवाल।।"

यहाँ पर अप्रस्तुत के वर्णन द्वारा प्रस्तुत का बोध कराया गया है अतः यहाँ अन्योक्ति अलंकार है।

10). विरोधाभास

परिभाषा -- जहाँ विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास दिया, जाए, वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है। अथवा जहाँ वास्तविक विरोध न होने पर भी विरोध का आभास हो वहाँ विरोधाभास अलंकार होता है; जैसे --
"या अनुरागी चित्त की, गति समुझे नहिं कोय।
ज्यों ज्यों बूड़ै स्याम रंग, त्यों त्यों उज्ज्वल होय।।"

यहाँ पर श्याम (काला) रंग में डूबने से उज्ज्वल होने का वर्णन है अतः यहाँ विरोधाभास अलंकार है।

11). विशेषोक्ति

परिभाषा -- जहाँ कारण के रहने पर जैसे भी कार्य नहीं होता है वहाँ विशेषोक्ति अलंकार होता है; जैसे --
"पानी बिच मीन पियासी।
मोहि सुनि सुनि आवै हासी।।"

12). प्रतीप

परिभाषा -- प्रतीप का अर्थ है – 'उल्टा या विपरीत'। 
जहाँ उपमेय का कथन उपमान के रूप में तथा उपमान का उपमेय के रूप में किया जाता है, वहाँ प्रतीप अलंकार होता है; जैसे --
"उतरि नहाए जमुन जल, जो शरीर सम स्याम" 

यहाँ यमुना के श्याम जल की समानता रामचन्द्र के शरीर से देकर उसे उपमेय बना दिया है, अतः यहाँ प्रतीप अलंकार है।

13). अर्थान्तरन्यास

परिभाषा -- जहाँ किसी सामान्य बात का विशेष बात से तथा विशेष बात का सामान्य बात से समर्थन किया जाए, वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है; जैसे --
"सबै सहायक सबल के, कोउ न निबल सुहाय।
पवन जगावत आग को, दीपहिं देत बुझाय।।"


यहा हमने अर्थालंकार किसे कहते हैं इसके बारे में विस्तार से समझा। हमने देखा की अर्थालंकार की परिभाषा क्या होती है, अर्थालंकार कितने प्रकार के होते है और अर्थालंकार के उदारहण आदि। यानी की इस आर्टिकल में हमने अर्थालंकार के सभी महत्वपुर्ण प्रश्नो को अच्छे से समझा। हमे आशा है की आपको ये आर्टिकल अच्छा लगा होगा। और हम उमीद करते है इस आर्टिकल की सहायता से arthaalankar kise kahate hain आपको अच्छे से समझ में आ गया होगा। अगर आपके मन में कोई सवाल हो, आप हमे नीचे कमेंट करके पुछ सकते है। इस आर्टिकल को आप अपने दोस्तो के साथ शेयर जरुर करे। 

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