कोशिका किसे कहते हैं ? कोशिका सिध्दान्त एवं इसके भाग

कोशिका किसे कहते हैं

कोशिका किसे कहते हैं (koshika kise kahate hain)

सभी जीवधारियों के शरीर का निर्माण कोशिकाओं से होता है। कोशिका में समस्त जैविक क्रियायें सम्पन्न होती है। कोशिका मे पैतृक गुणों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुँचाने वाले तत्व निहित होते हैं। कोशिका जीवन की संरचनात्मक, क्रियात्मक एवं आनुवंशिक इकाई कहलाती है
जन्तु तथा पादप कोशिकाओं की मूलभूत संरचना एकसमान होती है। इस कारण कोशिका को जीवन की आधारभूत इकाई  (basic unit of life) मानते हैं। लोयेबी तथा सीकेविट्ज (Loewy and Sickevitz-1963) के अनुसार कोशिका जीवों की संरचना तथा जैविक क्रियाओं की इकाई है जो वर्णात्मक पारगम्य झिल्ली से घिरी होती है।

कोशिका की खोज

कोशिका से सम्बन्धित ज्ञात इतिहास लगभग 350 वर्ष पुराना है। इसका इतिहास सूक्ष्मदर्शी के इतिहास से जुड़ा हुआ है क्योंकि कोशिका का अध्ययन नग्न नेत्रों से नहीं किया जा सकता। हालैण्ड निवासी जैकेरियस जैनसेन (Zacharias Janssen) ने सर्वप्रथम संयुक्त सूक्ष्मदर्शी का निर्माण 1590 में किया था। अंग्रेज वैज्ञानिक रॉबर्ट हुक (Robert Hooke, 1665) ने स्वनिर्मित सूक्ष्मदर्शी की सहायता से कार्क की पतली पर्त की आन्तरिक संरचना का अध्ययन किया। इसमें उन्हें मधुमक्खी के छत्ते जैसी संरचनायें दिखाई दीं। इन छोटे-छोटे कोष्ठों को रॉबर्ट हुक ने कोशिका (cell) कहा।

हालैणड निवासी एण्टानी वॉन ल्युवेनहॉक (Antony Van Leeuwenhoek, 1632-1723) ने (1664) में जीवाणु, प्रोटोजोआ तथा अन्य सूक्ष्मजीवों (micro-organism ) का वर्णन किया। ग्रयू (Grew, 1641 - 1712 ) और मैलपीघी (Malpighi, 1628-94) ने सूक्ष्मदर्शी की सहायता से वनस्पति कोशिकाओं का अध्ययन किया। इन्होंने सूक्ष्मदर्शी द्वारा रन्ध्रों, वाहिकायें (vessels), तन्तु (fibers), मृदूतक (parenchyma) आदि का अध्ययन किया।

लारेन्जओकेन (Lorenzoken, 1805) ने अध्ययन के पश्चात घोषणा की कि सभी जन्तु और पौधे कोशिकाओं से बने होते हैं। रॉबर्ट ब्राउन (Robert Brown , 1831) ने कोशिका में केन्द्रक का पता लगाया। डुजार्डिन (Dujardin , 1835) ने कोशिका में अर्धतरल पदार्थ की उपस्थिति का पता लगाया और इसे सारकोड (sarcode) नाम से पुकारा। पुरकिंजे ने कोशिका के पदार्थ को जीवद्रव्य कहा। ह्यूगो वान मोल (Hugo Von Mohl , 1846) ने जीवद्रव्य के गुणों का वर्णन किया। मैक्स शुज्ले (Schultze , 1861) ने जीवद्रव्य मत (protoplasm theory) प्रस्तुत की जिसके अनुसार सभी जीवधारियों के जीवद्रव्य की विशेषताये लगभग समान होती हैं। हक्सले (Huxtey, 1868) ने जीवद्रव्य को जीवन का भौतिक आधार (physical basis of life) कहा। स्ट्रॉसबर्गर (Strasburger, 1880) ने केन्द्रक की संरचना का अध्ययन किया। वाल्डेयर (Waldeyer, 1881) ने गुणसूत्र का अध्ययन किया और इन्हें गुणसूत्र नाम दिया।

1932 में इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार नॉल (Knoll) तथा रस्का (Ruska) ने किया। इसके फलस्वरूप कोशा अंगकों की संरचना का पता लगा। वाटसन और क्रिक (Watson and Crick, 1953) ने DNA का प्रतिरूप (model) प्रस्तुत किया। हरगोविन्द खुराना (1968) ने जीन (gene) का कृत्रिम संश्लेषण किया।

कोशिका सिद्धान्त किसे कहते हैं

इसका प्रतिपादन मैथियास श्लाइडेन (Marthias Scheilden - 1838) तथा थियोडॉर श्वान (Theodore Schwann - 1839) ने किया। इसके अनुसार

(1). सभी जीवधारियों का शरीर एक अथवा अनेक कोशिकाओं से मिलकर बना होता है।

(2). कोशिका जीवधारी के शरीर की मूलभूत इकाई होती है। समस्त जैविक क्रियायें कोशिकाओं द्वारा सम्पन्न होती है।

(3). कोशिकायें आनुवंशिकता की भी इकाई होती है।

(4). सभी कोशिकाओं की उत्पत्ति पूर्व-उपस्थित कोशिकाओं से होती है। ऐसा कोशिका विभाजन के कारण होता है (विरकोव- Virchow)।

सभी जीवधारियों का विकास एक कोशिका से ही प्रारम्भ होता है। एककोशिकीय जीवधारियों में विभाजन के पश्चात बनी कोशिका पृथक होकर स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करने लगती है। इसके विपरीत बहुकोशिकीय जीवधारियों में कोशिका में निरन्तर विभाजन होते रहने से बहुकोशिकीय जीवधारी का विकास हो जाता है।

कोशिका का निर्माण जीवद्रव्य (protoplasm) से होता है। जन्तु कोशिका में जीवद्रव्य चारों ओर से वर्णात्मक पारगम्य कोशाकला से घिरा होता है। पादप कोशिकाओं में वर्णात्मक पारगम्य कोशाकला के चारों ओर निर्जीव कोशिकाभित्ति (cell wall) होती है। कोशिकाभित्ति में अनेक सूक्ष्म छिद्र प्लैज्मोडेस्मेटा (plasmodesmata) होते हैं, इनके माध्यम से एक कोशिका का जीवद्रव्य समीपवर्ती कोशिका के जीवद्रव्य से जुड़ा रहता है। कोशिका की संरचना अत्यन्त जटिल होती है, यह एक सुव्यवस्थित आणविक फैक्ट्री की तरह होती है।


कोशिकाओं के प्रकार (Types of Cells in hindi)

संगठन (संरचना) के आधार पर कोशिकायें दो प्रकार की होती हैं 
1) --- प्रोकेरियोटिक कोशिकायें (Prokaryotic cells)
2) --- यूकेरियोटिक कोशिकायें (Eukaryotic cells)


(1). प्रोकेरियोटिक कोशिकायें ---

इन कोशिकाओं में केन्द्रक कला के अभाव के कारण संगठित केन्द्रक नहीं होता है। केन्द्रकीय पदार्थ कोशाद्रव्य में पड़े रहते हैं। इन कोशिकाओं में माइटोकॉण्ड्रिया , लवक , अन्तःप्रद्रव्यी जालिका , गॉल्जीकाय , तारककॉय आदि कोशिकांग (cell organelles) नहीं पाये जाते हैं। कोशाद्रव्य में कोशिकाद्रव्यी गति (cyclosis) स्पष्ट नहीं होती है । राइबोसोम्स 70S प्रकार के होते हैं। डी ० एन ० ए ० में हिस्टोन प्रोटीन का अभाव होता है। जीवाणुओं (bacteria) तथा नीले-हरे शैवालों (blue green algae) में इस प्रकर की कोशिकायें पायी जाती हैं।

(2). यूकेरियोटिक कोशिकायें ---

केन्द्रक कला की उपस्थिति के कारण इन कोशिकाओं में संगठित केन्द्रक पाया जाता है। इन कोशिकाओं में माइटोकॉण्ड्रिया , लवक , तारककाय , गॉल्जीकाय , अन्तःप्रद्रव्यी जालिका आदि कोशिकांग पाये जाते हैं। इनमें राइबोसोम्स 80S प्रकार के होते हैं। डी ० एन ० ए ० में हिस्टोन प्रोटीन पायी जाती है। जीवाणुओं और नीले-हरे शैवालों के अतिरिक्त अन्य जीवधारियों की कोशिकायें यूकेरियोटिक प्रकार की होती हैं।

कोशिका के भाग (Parts of Cell in hindi)

पादप कोशिका में निम्न तीन मुख्य भाग होते हैं
1). कोशिकाभित्ति  (Cell wall)
2). जीवद्रव्य  (Protoplasm)
3). रिक्तिका  (Vacuole)

(1). कोशिकाभित्ति ---

पादप कोशिका चारों ओर से एक रक्षात्मक कोशिकाभित्ति (cellwall) से घिरी होती है। 1665 में रॉबर्ट हुक (Robert Hooke) ने कॉर्क की पतली पर्त में कोशिकाभित्ति ही देखी थी। कोशिकाभित्ति का स्रावण जीवद्रव्य द्वारा होता है। जन्तु कोशिकाओं में कोशिकाभित्ति का अभाव होता है।

कोशिका के केन्द्रक विभाजन के पश्चात दोनों पुत्री केन्द्रकों के बीच कैल्शियम तथा मैग्नीशियम पेक्टेट की एक मध्य पटलिका (middle lamella) बनती है। मध्य पटलिका पर प्रारम्भिक कोशाभित्ति, द्वितीयक कोशाभित्ति एवं तृतीयक कोशाभित्ति बन जाने से कोशिकाभित्ति स्थूलित हो जाती है। कोशिकाभित्ति का लचीलापन समाप्त हो जाता है और कोशिका एक निश्चित आकृति ग्रहण कर लेती है। कोशिकाभित्ति मुख्यतया सेल्यूलोस (cellulose) से बनी होती है। ग्लूकोस के अणु परस्पर मिलकर सेल्यूलोस अणु बनाते हैं । सेल्यूलोस अणुओं की लगभग 100 शृंखलायें परस्पर मिलकर एक माइसिल (micelle) या प्रारम्भिक तन्तुक (elementary fibril) बनाते हैं। लगभग 20 माइसिल या प्रारम्भिक तन्तुक मिलकर एक सूक्ष्म तन्तुक (micro - fibril) बनाते हैं। लगभग 250 सूक्ष्म तन्तुक (micro - fibril) परस्पर मिलकर एक तन्तुक (फाइब्रिल fibril) बनाते हैं। कोशिकाभित्ति तन्तुकों (fibrils) से मिलकर बनी होती है। सेल्यूलोस से बनी भित्ति जल तथा विलेय खनिज लवणों के लिए पारगम्य होती है। कोशिकाभित्ति पर क्यूटिन (cutin) , लिग्निन (lignin), सुबेरिन (suberin) आदि के एकत्र हो जाने पर कोशिकाभित्ति अपारगम्य हो जाती है।

कोशिकाभित्ति के कार्य ---
(1) -- कोशिकाभित्ति कोशिका का बाह्य कंकाल (exoskeleton) का कार्य करती है। यह कोशिका को दृढ़ता तथा सुरक्षा प्रदान करती है।
(2) -- कोशिका को विशिष्ट आकार प्रदान करती है।
(3) -- पदार्थों के आवागमन को नियन्त्रित करने में सहायता करती है।

(2). जीवद्रव्य --- 

जीवद्रव्य की खोज डुजार्डिन (Dujardin) ने 1835 में की थी। पुरकिंजे (Purkinje, 1837) ने कोशिका में पाये जाने वाले पदार्थ को जीवद्रव्य (protoplasm) नाम दिया था। ह्यूगो वॉन मोल (Hugo von Mohl, 1846) ने जीवद्रव्य का वर्णन किया। हसले (Hurley) ने जीवद्रव्य को " जीवन का भौतिक आधार " बताया जीवद्रव्य जीवन का सार होता है।

जीवद्रव्य के भौतिक गुण (Physical properties of Protoplasm)
(1). यह स्वच्छ , रंगहीन , गाढ़ा , लचीला , कणिकामय , अर्धतरल होता है।
(2). रंगद्रव्यों (pigments) को छोड़कर यह पारदर्शी होता है। केन्द्रकद्रव्य का घनत्व कोशाद्रव्य से अधिक होता है। 
(3). यह जल में अघुलनशील होता है ; यद्यपि इसमें जल काफी मात्रा में होता है।
(4). जीवद्रव्य 60 ° C या अधिक ताप पर अवक्षेपित जाता है।
(5). जीवद्रव्य बाह्य उद्दीपनों के प्रति संवेदनशील होता है। यह विद्युत का सुचालक होता है।
(6). इसकी भौतिक प्रकृति बदलती रहती है। यह सॉल-जैल (sol-gel) अवस्था में बदलता रहता है।
(7). इसमें ब्राउनियन गति (Brownian movement) होती है।
(8). जीवद्रव्य प्रवाही गति (streaming movement) को प्रदर्शित करता है। 
यह निम्न प्रकार की हो सकती है 
(क) -- जीवद्रव्य भ्रमण (Cyclosis)
जब जीवद्रव्य केन्द्रीय रिक्तिका के चारों ओर केवल एक दिशा में घूमता है तो इसे घूर्णन (rotation) कहते हैं, जैसे हाइड्रिला (Hydrilla) की पत्ती की कोशिकाओं में जब जीवद्रव्य एक ही कोशिका में अनेक दिशाओं में घूमता है तो इसे परिसंचरण (circulation) कहते हैं, जैसे ट्रेडेस्कैन्शिया (Tradescantia) के पुंकेसरीय रोम में।
(ख) -- पक्ष्माभिकीय गति (Ciliary movement)
इसमें जीवद्रव्य की गति पक्ष्माभिकि (cilia) के द्वारा होती है, जैसे क्लैमाइडोमोनास (Chlamydomonas) में।
(ग) -- अमीबीय गति (Amoeboid movement)
जीवद्रव्य कूटपाद ( pseudopodia ) के द्वारा गति करता है , जैसे स्लाइम मोल्ड (slime mold) में

(9). जीवद्रव्य एक जटिल, बहुकलीय (polyphase), कोलॉइडी तन्त्र (colloidal system) होता है। 
जीवद्रव्य के रासायनिक गुण (Chemical properties Protoplasm) --- जीवद्रव्य का रासायनिक संघटन परिवर्तनशील होता है। जीवद्रव्य कोशिका से बाहर निकालने पर और विश्लेषण करने पर नष्ट हो जाता है। रासायनिक दृष्टि से जीवद्रव्य एक जटिल कोलॉइडी तन्त्र (complex colloidal system) माना जाता है। जीवद्रव्य का वितरण माध्यम (dispersion medium) पानी, प्रोटीन्स (proteins) तथा वसाओं (fats) का संयोजन है। जीवद्रव्य में सारे रासायनिक पदार्थ-तत्व (elements) और यौगिक (compounds) इस प्रकार संगठित रहते हैं कि इसमें जीवन के लक्षण विकसित हो जाते हैं।

जीवद्रव्य में ऊर्जा का विशेष महत्त्व है। ऊर्जा विभिन्न स्रोतों से प्राप्त की जाती है। ऊर्जा के कारण जीवद्रव्य तन्त्र अत्यन्त सक्रिय एवं शक्तिशाली व्यवस्था बनाता है। जीवद्रव्य का रासायनिक संघटन मूल रूप से एकसमान होता है लेकिन विभिन्न जातियों में इसका वास्तविक संघटन भिन्न-भिन्न होता है। एक ही जीवधारी की विभिन्न कोशिकाओं में इसका संघटन भिन्न भिन्न होता है।

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