रसखान का जीवन परिचय - Raskhan ka jivan parichay

रसखान का जीवन परिचय

रसखान जी का जीवन परिचय (Raskhan ka jivan parichay)

जन्म           ---   सन् 1538 ई।
जन्म स्थान   ---   हरदोई।
मृत्यु             ---   सन् 16183 ई।
शैली             ---   भावात्मक।
छन्द             ---    कवित्त दोहा सवैया।
रचनाएँ          ---    सुजान सखान प्रेम वाटिका।

रसखान का जीवन परिचय

जीवन-परिचय --- रसखान का असली नाम सैय्यद इब्राहीम था परन्तु काव्य जगत में वे सखान के नाम से ही प्रसिद्ध है। रसखान मुसलमान पठान थे और दिल्ली के पठान बादशाहों के वंशज थे। इनका जन्म सन् 1558 ई . में लगभग दिल्ली में हुआ था इनका पालन पोषण राजकीय परम्परा के अनुसार ही हुआ। मुगल पठान संघर्ष के कारण वे दिल्ली छोड़कर चले गये थे।

कहा जाता है कि युवावस्था मे रसखान का चालन - चलन ठीक नहीं था। वे स्वभाव से प्रेमी हृदय व्यक्ति थे । प्रारम्भ में इनका प्रेम लौकिक था किन्तु विठ्ठलानाथ जी के सम्पर्क में आने पर उनक लौकिक प्रेम भगवान कृष्ण के प्रति अलौकिक प्रेम में बदल गया । उन्हें संसार से विरक्ति हो गई। विट्ठलनाथ जी ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया। उनके प्रभाव से रसखान कृष्ण के सच्चे भक्त हो गये। वे जितना कृष्ण के रूप सौन्दर्य पर मुग्ध थे उतना ही उनकी लीला भूमि ब्रज के प्राकृतिक सौन्दर्य पर मोहित थे। जीवन के शेष भाग में रसखान कृष्ण-भक्ति से ओत-प्रोत सरस और मार्मिक रचनाएँ करते रहे । ' दो सौ वैष्णवों की वार्ता ' नामक ग्रन्थ में रसखान को उच्चकोटि का कृष्ण भक्त कवि कहा गया है। ब्रजभूमि और ब्रजराज के दीवाने रसखान लगभग 60 वर्ष की आयु में सन् 1618 में स्वर्गधाम सिधार गये।

और भी जीवन परिचय---

रसखान का साहित्यिक परिचय

साहित्यिक परिचय --- रसखान मूलतः फारसी भाषा के विद्वान् और कवि थे। किन्तु ब्रजभूमि में आकर ब्रजभाषा और ब्रज संस्कृति से प्रभावित होकर वे ब्रजभाषा में काव्य रचना करने लगे। मुसलमान होते हुए भी वे कृष्ण के इतने परम भक्त हो गये थे कि बहुत से हिन्दू भी नहीं हो सकते। उनके हृदय में भगवान कृष्ण और उनकी जन्म-भूमि ब्रजभूमि के प्रति अपार प्रेम था जिसे उन्होंने अपने काव्य में अभिव्यक्त किया है। इसी को लक्ष्य करके भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने मुसलमान भक्त कवियों के सम्बन्ध में सटीक कहा है --
                         
   " इन मुसलमान हरिजनन पै कोटिन हिन्दू बारिए। "

रसखान मूलत : एक रसिक कवि थे। उनकी सांसारिक रसिकता कृष्ण भक्ति में परिणित हो गयी और वे एक श्रेष्ठ कवि बन गये। इसलिए भक्ति और रस की दृष्टि से रसखान का काव्य वास्तव में रस की खान है । वस्तुतः रसखान का स्थान हिन्दी काव्य जगत की सगुण भक्ति धारा में बहुत ऊँचा है। वे अष्टछाप के महाकवियों की भाँति ब्रजभाषा साहित्य में सदा अमर रहेंगे।

रसखान की काव्य रचनाएँ 

रसखान --- रसखान की दो प्रसिद्ध काव्य रचनाएँ हैं -- सुजान-रसखान और प्रेम-वाटिका। सुजान-रसखान की रचना कविता और सवैया छन्द में हुई है। इसमें 139 छन्द हैं। यह भक्ति और प्रेम-विषय सरस काव्य है। प्रेम-वाटिका की रचना दोहा छन्द में हुई है। इसमें 25 दोहे तथा कुछ सोरठे हैं। यह विशुद्ध प्रेम काव्य है। कुछ विद्वान् ' रसखान शतक ' नाम से तीसरी रचना भी बताते हैं।

आचार्य रामचन्द्र शुक्लआचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदीजयशंकर प्रसादपदुमलाल पुन्नालाल बख्शीडॉ. राजेन्द्र प्रसादजय प्रकाश भारतीडॉ. भगवतशरण उपाध्यायश्री रामधारी सिंह दिनकरसूरदास 》तुलसीदासरसखानबिहारीलालसुमित्रानंदन पन्तमहादेवी वर्मापं. रामनरेश त्रिपाठी 》माखन लाल चतुर्वेदी 》सुभद्रा कुमारी चौहान 》त्रिलोचन 》केदारनाथ सिंहअशोक वाजपेयी

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