संविधान का अर्थ एवं परिभाषा | संविधान की प्रस्तावना | Samvidhan Kya Hai

भारतीय संविधान

इस आर्टिकल में हम bharat ka samvidhan और संविधान किसे कहते हैं इसके बारे में विस्तार से जानने वाले है। यहा हम भारतीय संविधान से सम्बंधीत कई सारे प्रश्नो को समझेंगे जैसे संविधान क्या है, संविधान की परिभाषा, संविधान का अर्थ और संविधान की प्रस्तावना इन सभी प्रश्नो के उत्तर आपको इस आर्टिकल में मिल जायेंगे। तो अगर आपको संविधान को अच्छे से समझना है तो आप इस आर्टिकल को अन्त तक पढ़ते रहिये। चलिए अब हम विस्तार से समझते है की samvidhan kya hai


Samvidhan Kya Hai (संविधान का अर्थ एवं परिभाषा)

संविधान उन आधारभूत नियमों व कानूनों का संग्रह है, जिनके आधार पर किसी देश का शासन चलाया जाता है। संविधान सरकार की शक्ति तथा स्रोत है। दूसरे शब्दों में, “संविधान उन मौलिक कानूनों का संग्रह है, जिनके अनुसार राज्य की शासन-व्यवस्था को संचालित करने के लिए नियमों तथा कानूनों का सृजन किया जाता है संविधान में संगृहीत ये नियम व सिद्धान्त सरकार के संगठन, शक्ति एवं कार्यों का निर्धारण करते हैं।"

ब्राइस के अनुसार – “संविधान ऐसे निश्चित नियमों का संग्रह होता है, जिनसे सरकार की कार्यविधि प्रतिपादित होती है और जिनके द्वारा उनका संचालन होता है।" 

फाइनर के अनुसार – “संविधान आधारभूत राजनीतिक संस्थाओं की व्यवस्था होती है।" 

डायसी के अनुसार – "संविधान का अभिप्राय उन समस्त नियमों से है, जो प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से राज्य की सार्वभौमिक शक्तियों के वितरण अथवा प्रयोग को निर्धारित करते हैं।"

संविधान का महत्त्व (samvidhan ka mahatva)

शासनतन्त्र समुचित ढंग से चलता रहे, इसके लिए संविधान का होना नितान्त आवश्यक है। प्रजातन्त्रीय देशों में तो संविधान का महत्त्व और बढ़ भी जाता है। संविधान देश की सरकार को नियन्त्रित करता है, जिससे वह स्वेच्छाचारी या निरंकुश न बन सके। साथ ही संविधान देश के नागरिकों के भौतिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रताओं की रक्षा भी करता है। लोकतन्त्रात्मक देशों में संघ सरकार और प्रान्तीय सरकारों में शक्ति-विभाजन होने के कारण संविधान इसलिए आवश्यक हो जाता है, जिससे उनके बीच शक्ति सन्तुलन बना रहे। सरकार के विभिन्न अंगों में पारस्परिक सम्बन्ध सहयोगपूर्ण रहे और आपसी सामंजस्य बना रहे, इसके लिए भी संविधान का होना परम आवश्यक होता है।

भारतीय संविधान के निर्माण की पृष्ठभूमि

सन् 1924 ई० में पं० मोतीलाल नेहरू ने स्पष्ट शब्दों में कहा था, "भारत का संविधान बनाने के लिए भारतीय संविधान सभा का निर्माण किया जाना चाहिए।" 1938 ई० में पं० जवाहरलाल नेहरू का विचार था, "स्वतन्त्र भारत का संविधान बिना किसी बाह्य हस्तक्षेप के वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित सभा द्वारा बनाया जाय। "1939 ई० के कांग्रेस अधिवेशन में इस माँग को दोहराते हुए इस आशय का प्रस्ताव पारित किया गया कि एक स्वतन्त्र देश के संविधान निर्माण का एकमात्र तरीका संविधान सभा होगी। सिर्फ प्रजातन्त्र और स्वतन्त्रता में विश्वास न रखनेवाले ही इसका विरोध कर सकते हैं। अंग्रेजी सरकार ने भारतीयों की इस माँग को अस्वीकार कर दिया। कालान्तर में 1946 की मन्त्रिमण्डल मिशन योजना में अंग्रेजों ने भारतीय संविधान सभा के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।

संविधान निर्मात्री सभा

मन्त्रिमण्डल (कैबिनेट) मिशन योजना के आधार पर जुलाई, 1946 ई० में संविधान सभा के चुनाव हुए। संविधान सभा के कुल 389 स्थानों में से प्रान्तों के लिए 296 स्थानों के लिए चुनाव हुए। इसमें से 211 स्थान कांग्रेस को, 73 स्थान मुस्लिम लीग, 4 स्थान अन्य दलों को तथा 8 स्थान स्वतन्त्र उम्मीदवारों को प्राप्त हुए। 93 स्थान भारतीय रियासतों के लिए थे, किन्तु वे पूरे भरे न जा सके। संविधान सभा में महात्मा गाँधी व जिन्ना को छोड़कर सभी प्रमुख नेता शामिल थे। मुख्य नेताओं में पं० नेहरू, डॉ० राजेन्द्र प्रसाद, सरदार पटेल, श्रीमती सरोजिनी नायडू, श्रीमती दुर्गाबाई देशमुख, श्रीमती हंसा मेहता और श्रीमती रेणुका राय प्रमुख थीं।

संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1946 ई० को अस्थायी अध्यक्ष डॉ० सच्चिदानन्द सिन्हा की अध्यक्षता में हुई। इसमें मुस्लिम लीग के सदस्यों ने भाग नहीं लिया। 11 दिसम्बर, 1946 को स्थायी अध्यक्ष डॉ० राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में दूसरी बैठक हुई। डॉ० प्रसाद संविधान निर्माण की समाप्ति तक संविधान सभा के अध्यक्ष बने रहे।

संविधान सभा द्वारा समितियों का गठन

संविधान सभा द्वारा कई समितियों का गठन किया गया; जैसे - संघीय अधिकार समिति, संघीय संविधान समिति, प्रान्तीय संविधान समिति, अल्पसंख्यक समिति, मौलिक अधिकार समिति, प्रारूप समिति आदि। इन समितियों में सबसे महत्त्वपूर्ण समिति प्रारूप समिति थी।

प्रारूप समिति

संविधान को अन्तिम रूप देने के लिए संविधान सभा ने डॉ० भीमराव अम्बेडकर की अध्यक्षता में सात सदस्यों की एक 'प्रारूप समिति' (Drafting Committee) नियुक्त की। प्रारूप समिति ने अपना प्रारूप 21 फरवरी, 1948 को प्रस्तुत किया। यह प्रारूप 5 नवम्बर, 1948 को संविधान सभा के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया गया। अन्त में 26 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा ने 395 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियोंवाले प्रारूप को पारित कर दिया। संविधान पारित होने में 63 लाख 96 हजार, 729 रु० व्यय हुए और 2 वर्ष, 11 माह, 18 दिन का समय लगा।

भारतीय संविधान के प्रमुख स्त्रोत

संविधान निर्मात्री सभा ने भारत के लिए जिस संविधान की रचना की वह एक अनूठा संविधान है और इस अनूठेपन में विश्व के अनेक संविधानों के अनेक अच्छे गुणों का सम्मिश्रण है

1). ब्रिटेन का संविधान --- ब्रिटेन के संविधान से संसदीय शासन प्रणाली, कानून निर्माण प्रक्रिया, एकल नागरिकता तथा स्पीकर का पद ग्रहण किया गया है।

2). अमेरिका का संविधान --- अमेरिका के संविधान से सर्वोच्च न्यायालय, स्वतन्त्र न्यायपालिका, उपराष्ट्रपति का पद आदि बातें ग्रहण की गयी हैं।

3). कनाडा तथा आयरलैण्ड का संविधान --- कनाडा के संविधान से संघीय व्यवस्था तथा आयरलैण्ड के संविधान से नीति निर्देशक तत्त्व आदि ग्रहण किये गये हैं।

4). आस्ट्रेलिया का संविधान --- ऑस्ट्रेलिया के संविधान से प्रस्तावना की भाषा तथा समवर्ती सूची की व्यवस्था को ग्रहण किया गया है।

5). दक्षिणी अफ्रीका का संविधान --- दक्षिणी अफ्रीका के संविधान से संशोधन की प्रक्रिया को ग्रहण किया गया है।

6). सोवियत गणराज्य का संविधान --- सोवियत गणराज्य के संविधान से मूल कर्त्तव्यों को ग्रहण किया गया।

7). भारत अधिनियम, 1935 --- भारतीय अधिनियम, 1935 से संघ और राज्यों के बीच संवैधानिक सम्बन्ध राष्ट्रपति के संकटकालीन अधिकारों की धाराएँ आदि बातों को ग्रहण किया गया है।

संविधान की प्रस्तावना

प्रस्तावना संविधान का सबसे महत्त्वपूर्ण अंग है। इसके द्वारा संविधान के मूल उद्देश्यों व लक्ष्यों को स्पष्ट किया जाता है। भारतीय संविधान की मूल प्रस्तावना में 42 वें संवैधानिक संशोधन, 1976 द्वारा कुछ शब्दों को जोड़ा गया और अब संविधान की प्रस्तावना इस प्रकार है -

"हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न समाजवादी पन्थनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा अखण्डता सुनिश्चित करनेवाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ई० (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी-संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।"

भारतीय संविधान की विशेषताएँ

भारतीय संविधान एक व्यावहारिक संविधान है। यह संविधान अपनी विशेषताओं के कारण विश्व का अनोखा संविधान है। भारतीय संविधान में अनेक उल्लेखनीय विशेषताएँ हैं, जिनमें से प्रमुख इस प्रकार हैं

1). विस्तृत तथा व्यापक प्रलेख --- यह विश्व के विशालतम संविधानों में से एक है। आरम्भ में इसमें 22 भाग, 395 अनुच्छेद एवं 8 अनुसूचियाँ थीं। कालान्तर में विभिन्न संशोधनों के फलस्वरूप इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। इसकी विशालता के कारण सर आइवर जेनिंग्स ने इसे 'विश्व का सबसे बड़ा और विस्तृत संविधान' कहा है। वर्तमान में संविधान में 395 धाराएँ, 12 अनुसूचियाँ तथा 4 परिशिष्टियाँ हैं।

2). सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य --- संविधान की प्रस्तावना में भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है। सम्पूर्ण प्रभुत्वसम्पन्न का तात्पर्य यह है कि भारत अपनी गृह एवं वैदेशिक नीति में पूर्णतः स्वतन्त्र है। लोकतन्त्र का अर्थ राज्य की सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित है। गणराज्य का आशय यह है कि हमारे देश का प्रधान वंशानुगत न होकर एक निश्चित अवधि के लिए चुना हुआ राष्ट्रपति होगा।

3). समाजवादी राज्य --- 42 वें संवैधानिक संशोधन, 1976 द्वारा प्रस्तावना में भारत को समाजवादी राज्य घोषित किया गया है। समाजवादी राज्य से अभिप्राय यह है कि समस्त देशवासियों को अपने विकास तथा उन्नति के समान अवसर प्राप्त होंगे।

4). संघात्मक शासन --- भारतीय संविधान द्वारा देश में संघात्मक शासन की स्थापना की गयी है, जिसके अनुसार यहाँ दो समान सत्ताएँ केन्द्र और राज्य हैं। इनके बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है, स्वतन्त्र न्यायपालिका और संविधान को सर्वोच्चता प्रदान की गयी है।

5). धर्म निरपेक्ष (पन्थ निरपेक्ष) राज्य की स्थापना --- संविधान ने धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना की है। धर्म निरपेक्ष का आशय ऐसे राज्य से होता है, जहाँ राज्य का कोई धर्म नहीं होता। दूसरे शब्दों में, "भारतीय संविधान द्वारा ऐसे धर्म निरपेक्ष राज्य की स्थापना की गयी है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को उसकी इच्छानुसार धर्माचरण का अधिकार दिया गया है। "संविधान के अनुच्छेद 25 में कहा गया है, "सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार व स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए सब नागरिकों की अन्तःकरण की स्वतन्त्रता का तथा धर्म को अबाध रूप से मनाने, आचरण करने और प्रचार करने का समान हक होगा।"

6). संसदीय शासन प्रणाली --- भारत में संसदीय शासन प्रणाली की स्थापना की गयी है। इस व्यवस्था में वास्तविक कार्यकारी शक्ति मन्त्रिमण्डल के पास होती है और वह संसद् (लोकसभा) के प्रति उत्तरदायी है।

7). शक्तिशाली केन्द्र --- भारतीय संविधान ने भारतीय संघ को एकात्मक संघ बनाया है, जिसमें केन्द्र शक्तिशाली रहता है। संविधान ने समवर्ती सूची के विषयों पर केन्द्र द्वारा बनाये गये कानूनों को प्राथमिकता प्रदान की है। आवश्यकता पड़ने पर केन्द्रीय सरकार राज्यों में आपातकाल की घोषणा करके वहाँ की कार्यपालिका शक्ति अपने हाथ में ले सकती है। इस प्रकार भारत में एक शक्तिशाली केन्द्र स्थापित है।

8). मूल अधिकारों की व्यवस्था --- भारतीय संविधान ने नागरिकों के लिए निम्न मूल अधिकारों की व्यवस्था की है

(i) समता का अधिकार
(ii) स्वतन्त्रता का अधिकार
(iii) शोषण के विरुद्ध अधिकार
(iv) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार
(v) संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार
(vi) संवैधानिक उपचारों का अधिकार

संविधान द्वारा नागरिकों को सात मूल अधिकार प्रदान किये गये थे किन्तु 44 वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1978 द्वारा सम्पत्ति के मूल अधिकार को समाप्त कर दिया गया और अब सम्पत्ति का अधिकार केवल कानूनी अधिकार रह गया है।

9). स्वतन्त्र न्यायपालिका --- भारत के संविधान में स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था की गयी है जो सभी प्रकार के हस्तक्षेपों से मुक्त है। देश में सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय व जिला स्तर पर जिला न्यायालय स्थापित हैं।

10). नीति-निर्देशक तत्त्वों का उल्लेख --- भारतीय संविधान में नागरिकों की आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक उन्नति के लिए नीति-निर्देशक तत्त्वों की व्यवस्था है। यद्यपि इन तत्त्वों के पीछे न्यायालय के प्रवर्तन की शक्ति नहीं है , तथापि ये हमारे देश के शासन के मूल आधार हैं।

11). लिखित तथा स्वनिर्मित --- हमारा संविधान लिखित व स्वनिर्मित है। हमारे संविधान में केन्द्र और राज्य की शक्तियों का स्पष्ट विभाजन है। हमारा संविधान निश्चित समय में भारतीयों द्वारा बनाया गया है , अतः यह निर्मित संविधान है।

12). वयस्क मताधिकार --- भारतीय संविधान द्वारा देश के सभी वयस्क (18 वर्ष आयु प्राप्त) स्त्री व पुरुष नागरिक को मतदानं का अधिकार प्रदान किया गया है चाहे वह किसी धर्म या समुदाय का हो।

13). एकल नागरिकता --- राष्ट्र की भावात्मक एकता को पुष्ट करते हुए भारतीय संविधान ने इकहरी (एकल) नागरिकता की व्यवस्था की है। यहाँ सभी नागरिक केवल भारत के नागरिक हैं, राज्यों के नहीं।

14). आपातकालीन व्यवस्था --- भारतीय संविधान ने संकटकालीन उपबन्धों की व्यवस्था की है, जिसके अनुसार संघात्मक शासन एकात्मक हो जाता है। महामहिम राष्ट्रपति निम्न परिस्थितियों में आपातकाल की उद्घोषणा कर सकते हैं।

(i) युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह होने पर (अनुच्छेद 352),
(ii) राज्यों में संवैधानिक तन्त्र के विफल हो जाने पर (अनुच्छेद 356),
(iii) वित्तीय संकट उत्पन्न होने पर (अनुच्छेद 360)।

15). लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना --- भारतीय संविधान द्वारा लोक-कल्याणकारी राज्य की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है, जिसमें किसी के श्रम अथवा स्वास्थ्य का दुरुपयोग न होगा, सभी नागरिकों को आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक न्याय प्राप्त होगा, सभी को समान अवसर प्राप्त होंगे अर्थात् भारत में लोक कल्याणकारी राज्य स्थापित होगा।

16). एक राष्ट्रभाषा की व्यवस्था --- राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के लिए संविधान द्वारा देवनागरी लिपि में हिन्दी को राष्ट्रभाषा का पद प्रदान किया गया है।

17). अस्पृश्यता का अन्त --- प्राचीन काल से ही अस्पृश्यता राष्ट्रीय एकता के लिए बाधक रही है, इसलिए संविधान के अनुच्छेद 17 के द्वारा अस्पृश्यता का अन्त कर दिया गया है। स्पष्ट उल्लेख है कि "अस्पृश्यता का अन्त किया जाता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध किया जाता है। अस्पृश्यता से उपजी नियोंग्यता को लागू करना अपराध होगा जो विधि के अनुसार दण्डनीय होगा।"

18). ग्राम पंचायतों की स्थापना --- देश के सर्वोत्तम कल्याण के लिए स्थानीय स्वशासन के अन्तर्गत ग्राम पंचायतों की स्थापना की गयी है।

इसके अतिरिक्त 42 वें संविधान संशोधन 1976 द्वारा भारतीय नागरिकों के 10 मूल कर्तव्यों का उल्लेख किया गया है। साथ अल्पसंख्यकों तथा पिछड़े हुए वर्गों के कल्याण के लिए संविधान में विशेष प्रावधान किये गये हैं।

भारतीय संविधान का स्वरूप

भारतीय संविधान का स्वरूप संघात्मक है या एकात्मक यह प्रश्न विवादास्पद है संविधान के आलोचकों का कहना है कि संविधान संघात्मक होते हुए भी एकात्मकता के लक्षणों से परिपूर्ण है।

प्रो० डी० एन० बनर्जी के अनुसार -- "भारत के संविधान का स्वरूप संघात्मक, परन्तु उसमें एकात्मकता की स्पष्ट झलक है।"

दुर्गादास बसु के अनुसार -- "भारतीय संविधान न तो पूर्णतया संघात्मक है और न पूर्णतया एकात्मक, वरन् दोनों का मिश्रण है।"

इस आर्टिकल में हमने samvidhan kya hai और संविधान का अर्थ क्या होता है इसके बारे में अच्छे से समझा। यहा पर हमने संविधान से सम्बन्धित कई सारे ऐसे प्रश्नो को देखा जोकि अक्सर हमे परीक्षाओं में पुछे जाते है जैसे संविधान किसे कहते हैं, संविधान का अर्थ, संविधान की परिभाषा और संविधान की प्रस्तावना इन सभी प्रश्नो के उत्तर इस आर्टिकल में बिल्कुल विस्तार से दिया गया है। हमने उमीद है इस आर्टिकल की सहायता से आपको bharat ka sanvidhan या samvidhan kya hai अच्छे से समझ आ गया होगा। अगर आपके मन में कोई सवाल हो तो, आप हमे नीचे कमेंट में पुछ सकते है और इस आर्टिकल को आप अपने मित्रो के साथ शेयर जरुर करे।

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